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इंडिया गेट तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है …सीमा फैज़ी

।सीमा फैज़ी ।

पेशे से पत्रकार सीमा फैज़ी पिछले 14 साल से सहारा मीडिया के साथ जुड़ी हुई हैं, स्वभाव से घुमक्कड़ सीमा को घूमना घूमाना …नए लोगों से मिलना, नई जगहों को जानना और समझना पसंद है। फिलहाल आप मुंबई में रहती हैं। 

 

शुक्रवार को हरियाणा के बाबा राम रहीम को दोषी ठहराये जाने के बाद जो हिंसा का दौर शुरु हुआजो खौफ और कानून व्यवस्था का मज़ाक सड़को पर उड़ा….जो कोर्ट की टिप्पणियां आईं….उसने दो साध्वियों की लड़ाई को राजनीति और सरकार की नाकामयाबी का प्रतीक बना दिया। इस पर खूब राजनीति हो रही है और आगे भी होगी….लेकिन इस हिंसा ने एक सवाल इस देश की महिलाओं के लिए भी खड़ा कर दिया….सवाल है कि वो कहां है….उनकी आवाज़ क्या है….वो क्या सोंचती है….पिछले हफ्ते ही एक और फैसला आया था…उसपर टीवी समाचार चैनलों के ज़रिए हमने कुछ महिलाओं की सोंच को सुना था….जाना था….समझा था …लेकिन तब भी और अब भी जब राम रहीम जैसे ताकतवर बाबा के खिलाफ फैसला आया है हम उन हज़ारों हज़ार बेटियों की…. उनकी मांओं की….या आधी आबादी की आवाज़ नहीं सुन पाये….वो क्या सोंचती है नहीं समझ पाए….

मुझे याद है जब निर्भया कांड हुआ था….हज़ारों की संख्या में महिलाएं सुरक्षा की मांग को लेकर इंडिया गेट पहुंची थी….उन्होने वहां डंडे खाए थे…पुलिस ने उन्हे घसीटा था…दौड़ाया था…. मारा था…लेकिन वो वहां से हटने को तैयार नहीं हुई थीं….वो नज़ारावो ताकतवर तस्वीरे अभी भी लोगों के दिमाग में बरकरार है….उस विरोध प्रदर्शन के बाद ही राजनैतिक पार्टियों को महिलाएं भी वोट बैंक नज़र आने लगी थी…उसके बाद ही योजनाओं में महिलाओं की भागीदारी पर ज़ोर बढ़ा उसके बाद ही सरकारें और विपक्ष महिला सुरक्षा को अपने महत्वपूर्ण मुद्दों में रखने लगे थे…उसके बाद ही देश ने बेटी बचाओं और बेटी पढ़ाओं के नारे को गंभीरता से लेना शुरु किया….ऐसा नहीं है कि पहले महिला सशक्तीकरण की आवाज़ नहीं थी….जरूर थी पर बस इतनी कि एक बिल ड्राफ्ट हुआ महिलाओं के आरक्षण का…उसे कई बार संसद में पेश किया गया और फाड़ दिया गया और फिर वो अपनी मौत मर गया….कहने का मतलब आवाज़ थी पर बेहद कमज़ोर और थोड़ी धीमी भी….लेकिन निर्भया आंदोलन से जो धमाका हुआ…उसने राजनीति से लेकर सरकार तक….परिवार से लेकर समाज तक को महिलाओं के बारे में सोंचने को मज़बूर किया….यानी 1847 के गद्दर में जैसे मेरठ छावनी का विद्रोह का प्रतीक बना ठीक उसी तरह इंडिया गेट पर हुए विरोध की तस्वीरें महिलाओं के संघर्ष का निशान बन गई।

अब सवाल ये है कि तीन तलाक हो या राम रहीम की हार तुम आज घर में क्यों हो….तुम उनको जवाब देने क्यों नहीं निकली जो सड़क से लेकर टीवी की स्क्रीन तक पर तुम्हारी जीत को बेमानी बता रहे है…..तुम क्या सोंचती हो….तुम क्या चाहती हो….बताने बाहर आओ…आओ इंडिया गेट पर और बता दो की चार राज्यों पंजाब, हरियाण, दिल्ली (यहां पुलिस केंद्र के पास है) और राजस्थान की सरकारे भले तुम्हारे साथ नहीं हैं….पर तुम राम रहीम के गुंड़ों से नहीं डरती….बता दो तुम उन दो साध्वियों के साथ हो जो इतने साल तक अकेले लड़ती रही…..बता दो तुम एक साथ तीन तलाक के डर से आज़ाद होकर खुश हो।

निर्भया के समय तुम विरोध करने निकली थी…आज अपने जश्न से फिर एक बार ऐसा धमाका करो की सरकारसमाजपरिवार सब हिल जाए….बाबा के गुंडे समझ जाएं कि वो सरकार को डरा सकते है तुम को नहीं…..सरकार समझ जाए की इसबार डर गए तो कहीं के नहीं रहेंगे….इसलिए निकलो अपने जीत का परचम उठा के…..निकलों जश्न के जरिए अपनी ताकत दिखाने….इंडिया गेट तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है….इंडिया गेट से फिर एक बार बदलाव की आंधी को तेज़ करो…

सीमा

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