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मुस्लिम तुष्टिकरण से दलित तुष्टिकरण की ओर बढ़ती राजनीति।

हाल के वर्षों तक ये माना जाता था कि देश के मुसलमानों को खुश करो और उनका एकमुश्त वोट बटोर कर सत्ता सुख हासिल करते रहो। और इसी तुष्टिकरण फार्मुले के बल पर कांग्रेस, समाजवादी और आरजेडी जैसी पार्टियां अपनी राजनीति चमकाती रहीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ये फार्मूला लगातार फ्लॉप होता दिख रहा है। एक ओर जहां मुस्लिम वोटर इनकी चालाकियों को समझने लगे हैं और आंख मूंदकर किसी को भी वोट देने से बचने लगे हैं वहीं बीजेपी ने मोदी के नेतृत्त्व में देश के नक्शे को भगवा रंग में रंग दिया है। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियां एक तरह से हाशिए पर पड़ी कराह रही हैं। ऐसे में हिन्दुत्व ब्रिगेड के इस जानलेवा हमले से कैसे उबरा जाए, आज राजनीतिक गलियारे में इस सवाल का हल ढूंडे नहीं मिल रहा। मुसलमानों का सॉलिड वोट बैंक पूरी तरह बिखर चुका है। हिंदुत्व की कॉपीराइट बीजेपी ने अपने नाम करवा रखी है। तो बचा कौन? दलित! एकाएक सबकी निगाहें मुसलमानों से भी ज्यादा सॉलिड वोट बैंक पर आकर टिक गयी हैं। और जब इस विकल्प का विश्लेषण किया गया तो समझ में आया कि मोदी के विजय रथ को रोकने का अब एकमात्र यही हथियार बचा है। लेकिन परेशानी यह है कि इसे साधा कैसे जाए। आजतक तो इन्हें भेड़ बकरियों की तरह ही हांका गया है। इन्हें पूरे देश में एक संगठित ताकत के रूप में इस्तेमाल करने लायक बनाने के लिए इन्हें पहले जागृत करना होगा और साथ ही साथ इन्हें अहसास दिलाना होगा कि मनुवादी ताकतों की नजर में ये दोयम दर्जे के हिन्दू हैं या शायद हिन्दू हैं भी नहीं। और इस योजना पर बड़े ही शातिर ढंग से काम शुरू हो भी हो चुका है। इधर पिछले दिनों यूपी, गुजरात और महाराष्ट्र की घटनाएं और मीडिया में इसे हिन्दुओं और दलितों के बीच संघर्ष के रूप में प्रचारित किया जाना पूरे गेम प्लान को उजागर करने के लिए काफी है। मुसलमान पहले ठगे जा चुके अब दलितों पर डोरे डाले जा रहे हैं।

देश में दलित राजनीति नई करवट ले रही है। मायावती, अठावले और रामविलास पासवान सरीखे दलित नेता अब चुकने लगे हैं। अब जिग्नेश और रावण जैसे युवा दलितों को आकर्षित करने लगे हैं। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि इस तरह की युवा पौध को पनपने में इतना वक्त क्यों लगा। इस राजनीतिक संक्रांति को समझने के लिए पिछले तीन चार दशकों की दलित राजनीति पर नजर डालनी होगी। इन वर्षों में दलितों को सामान्यतः कांग्रेस का ही वोट बैंक माना जाता रहा। इसी समय कांशीराम और बाद में मायावती ने कुछ हद तक इन्हें अपने साथ जोड़ने में सफलता पायी और इनके बूते सत्ता सुख हासिल किया। रामविलास पासवान खुद को दलित नेता के रूप में प्रचारित कर लगातार सत्ता की मलाई चाटते आ रहे हैं। लेकिन आर्थिक और सामाजिक स्तर पर देश के दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। वे 50 साल पहले जहां थे आज भी लगभग वहीं हैं। इस बीच वाम दलों ने भी इनका खूब इस्तेमाल किया और यहीं से दलित युवा का नक्सलवाद की तरफ भी झुकाव बढ़ा। लेकिन हर जगह ये बस इस्तेमाल ही होते रहे। इन्हें बहुत ज्यादा खुश करने की भी किसी ने कोशिश नहीं की क्योंकि अब तक तो यही लगता रहा कि इन्हें ज्यादा सर चढ़ाने की जरूरत क्या है? इनकी हालत ऐसे ही इतनी दयनीय है कि बस थोड़े से सपने दिखाओ और जहां मर्जी इस्तेमाल कर लो। अबतक तो यह काम एक साड़ी, एक कंबल, भरपेट खाना या दारू की बोतल दिखा कर ही हो जा रहा था और भविष्य में छोटे छोटे सपनों के साकार होने का आश्वासन, बस। लेकिन अब इतने से काम चलता नहीं दिख रहा। लड़ाई अब काफी बड़ी है। सामने दुश्मन दनदनाता हुआ हर किला फतह करता जा रहा है। मुसलमानों की नाराजगी का उसे कोई खौफ ही नहीं है। इसलिए, हे दरिद्र नारायण अब आपका ही आसरा है। अपनी ताकत को पहचानिए और इस घोर सामंतवादी, मनुवादी, दमनकारी शत्रु के खिलाफ संगठित होकर इसका दमन करें। बस, उसके बाद तो आप ही मालिक हैं और हम आपके चरणों के दास। हमें कुर्सी दिलवा दें और आप फिर से अपनी कुटिया में पउआ चढ़ाकर लोट जाएं।  तो पटकथा लिखी जा चुकी है। जगह जगह मंचन भी शुरू हो चुका है। नये नये नायक नेपथ्य से निकलकर मंच संभालने लगे हैं। अबतक के परिणाम भी उत्साहवर्धक ही हैं। इसलिए आगे ऐसे और भी बड़े बड़े आयोजनों के लिए तैयार रहें।

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