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‘‘इमाम-ए-हिंद: राम’’ एवं उससे संबंधित सीधे संवाद की एक रोचक कहानी-डॉ.मोहम्मद अलीम

डा. मोहम्मद अलीम
लेखक : डा. मोहम्मद अलीम

आज के इस भागमभाग जीवन में अगर कुछ पल भी सुकून का मयस्सर आ जाए तो इसे बड़ी ग़नीमत समझना चाहिए। 20 अक्तूबर कुछ ऐसा ही गुज़रा। दोपहर के समय से ले कर शाम तक एक कार्यक्रम में शामिल होने का मौक़ा मिला। यह कार्यक्रम था दिल्ली स्थित एक थियेटर ग्रुप की ओर से आयोजित पहला ‘‘तफ़रीह थियेटर फेस्टिवल’’ जिसे सिविल लाइंस में आयोजित किया गया था। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसका उद्देश्य दिल्ली वासियों को साफ सुथरा, साहित्यक रूचि से रचा बसा इंटरटेनमेंट फ़राहम करना था। इस तीन दिवसीय कार्यक्रम में नाटकों की प्रस्तुति के अलावह काव्य पाठ, संगीत प्रदर्शनी, दास्तानगोई, कहानी पाठ, व्यंग्य पाठ और फिर लेखकों से सीधा संवाद भी शामिल था।

इत्तेफ़ाक़ से इस तीन दिवसीय थियेटर फेस्टिवल की अयोजक प्रियंका शर्मा को मेरे एक ऐक्टर दोस्त मिनहाज ख़ान के ज़रिये मेरी याद भी आ गई। थोड़ी देर से ही सही मगर मुझे वहां आने का उनकी ओर से बाज़ाब्ता तौर पर निमंत्रण मिला। और फिर उनका फोन भी आया कि मैं इस कार्यक्रम में जरूर शामिल होऊं। मैं ने भी सोचा कि अवसर अच्छा है अपनी बात दर्शकों एवं पाठकों तक रखने का। विशेष रूप से अपने नाटक ‘‘इमाम-ए-हिंद: राम’’ के संबंध में जिसकी इन दिनों ख़ासी चर्चा है।

मेरे इस नाटक का विमोचन विगत 1 सितंबर को केरल के राज्यपाल एवं प्रसिद्ध इस्लामी चिंतक, श्री आरिफ मोहम्मद खान के द्वारा बड़ी सफलतपूर्वक दिल्ली के कंस्टीच्युशन क्लब में अदबी कॉकटेल एवं डायलॉग इनिएशियटिव फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित किया गया था। अदबी कॉकटेल और संप्रेषण मल्टी मीडिया ने इसे बड़ी साज सज्जा के साथ प्रकाशित किया है। उनके आने से प्रेस का ध्यान विशेष रूप से इस कार्यक्रम की ओर आकर्षित हुआ और दो दर्जन से अधिक अखबारों, न्युज पोर्टल और टीवी चैनलों पर इससे संबंधित रिपोर्टें और कार्यक्रम प्रसारित किए गए। खास तौर पर लोकसभा टीवी के द्वारा और चंद अन्य न्युज पोर्टल एवं चैनलों के द्वारा।

मुझे खुशी है कि यह विषय लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में काफी सफल रहा। मेरे कुछ दोस्तों ने तो एक समानांतर नाट्य प्रस्तुति खड़ी करने की कोशिश की। और दुख की बात यह है कि उसके निर्देशक महोदय ने मेरे नाटक की प्रस्तुति शैली की बड़े भोंडे तरीके से बिना किसी शर्म के कॉपी भी कर डाली। यानि जिस प्रकार मैं ने दृश्यों के बीच में उर्दू के क्लासिक शायरों के रामायण पर लिखित गीतों का प्रयोग किया है, उनको उन साहब ने भी उसी प्रकार कच्चे पक्के अंदाज़ से प्रस्तुत कर डाला। और हद तो तब हो गई जब उस नाटक के लेखक ने मेरे प्रयोग में लाए चंद एक गीतों के बोल भी हू ब हू इस्तेमाल कर डाले। यह अलग बात है कि उन गीतों को इस्तेमाल करने का उनका तरीका और दक्षता शायद हमारी प्रस्तुति के कहीं आस-पास भी न ठहरे। लेकिन एक बात तो अवश्य है कि इसे खुल्लम खुल्ला पलेगियरिज्म कहा जा सकता है जिससे बचा जाना चाहिए था। चूंकि उस नाटक के निर्देशक मेरे एक पुराने मित्र हैं और उन्हें मैं ने अपना नाटक ‘‘इमाम-ए-हिंद: राम’’ लिखने के तुरंत बाद पिछले साल अप्रेल में सुनाया था और उनके देमाग़ में नाटक के संवाद भले ही महफूज़ नहीं थे या रहे भी होंगे तो मेरी प्रस्तुति शैली अवश्य ही उनके देमाग में महफूज थी जिसका उन्होंने जी भर कर बिना किसी संकोच के लाभ उठाया और दर्शकों को अपने प्रयास से आकर्षित करने की कोशिश की। अब वह इस पलेगियाराइज्ड प्रस्तुति में कितने सफल रहे, यह तो मुझे नहीं मालूम क्योंकि उन्होंने मुझ से इस वादे के बाद भी कि सपरिवार आपको नाटक देखने के लिए आमंत्रित करूंगा, उस निमंत्रण का बस इंतजार की करता रह गया। उन्होंने शायद यही सोचा होगा कि उनकी प्रस्तुति देख कर मैं उनसे कोई सवाल न पूछ डालूं या फिर उनकी ओरजनिलिटी पर सवाल न खड़ा कर दूं। इसलिए बेहतर यही समझा कि मुझे आने ही न दिया जाए। हालांकि जब मेरे नाटक की दिसंबर में प्रस्तुति होगी तो लोगों को खुद ब खुद पता चल जाएगा कि उन्होंने प्रस्तुति शैली में कितना कुछ चुराने की कोशिश की है यदि कोई दोनों प्रस्तुतियों को देखने में कामयाबी हासिल कर ले या दोनों नाट्य आलेखों को पढ़ने में सफलता पा जाए।

इत्तेफ़ाक़ से उन साहब ने मेरे संस्कृति पुरस्कार से सम्मानित एक उर्दू उपन्यास, ‘‘ जो अमां मिली तो कहां मिली ’’ पर एक अप्रिय और बहुत ही ख़राब फिल्म भी अभी हाल ही में बनाई है और हमारे कई दोस्तों का गाढ़ी कमाई से हासिल किया हुआ कई लाख रूपया भी दाव पर लगाया है क्योंकि फिल्म बिक नहीं पा रही है। फिल्म की ऐसी दुर्गति मेरी निगाह में इस वजह से हुई कि निर्देशक महोदय ने स्वयं की अपनी लेखन क्षमता का मुजाहिरा करने का मन बना लिया था हालांकि उन्होंने कभी कोई लेख, कहानी या फिर कुछ और चीज लिखी ही नहीं और न ही उसे प्रकाशित कराया। उनके स्वयं पटकथा लिखने का कारण यह था कि उनके पास मुझ से पटकथा लिखवाने के पैसे नहीं थे या फिर वह इस मद में खर्च करना ही नहीं चाहते थे। इसलिए स्वयं की उसकी पटकथा लिख डाली और दिल्ली के कुछ अधकच्चे कलाकारों और टेक्निशियंस को ले कर वह फिल्म भी बना डाली। अंत में पूरे तीन साल तक जिद्दद्दोजेहद करने के बाद किसी प्रकार वह फिल्म पूरी हो पाई। पर जब तीन सालों के थका देने वाले इंतजार के बाद उसका टीवी स्क्रीन पर पहली बार हम लोगों के सामने प्रदर्शन किया गया तो दिल को बहुत तक्लीफ पहुंची। मेरे उपन्यास की रूह तो गायब थी ही, साथ ही कहानी का ऐसा चोंचो का मुरब्बा तैयार किया गया था कि आम तौर पर अधिक्तर देखने वालों को फिल्म देखने के बाद यह समझ में ही नहीं आया कि इन्होंने आख़िर बनाया क्या है और क्या कहने की कोशिश की है। यानी साफ शब्दों में कहूं तो लोगों को उनकी फिल्म की कहानी ही समझ में नहीं आई। कहानी की रूह उनके अपने ही वाहियत प्रयोग की बड़ी बेदर्दी से नज़र हो कर रह गई। बहरकैफ, मेरे एक ऐक्टर मित्र ने जिन्होंने सौभाग्य से इस फिल्म में एक छोटा सा रोल भी अदा किया था, उन्होंने मुझ से मेरे उपन्यास की मूल प्रति मंगाई और उसे जिज्ञासावश बड़े गौर से पढ़ा। और फिर एक दो दिन बाद उन्होंने फरमाया कि अलीम साहब, अगर फिल्म निर्देशक महोदय ने आपके उपन्यास को हू ब हू ही फिल्मा दिया होता तो वह एक अच्छी फिल्म बनाने में शायद कामयाब हो जाते। बहरहाल उनके पास अपनी रचनात्मक क्षमता का जो मुजाहिरा करने का सुनहरा और अनोखा मौक़ा था उसे बुरी तरह गंवा दिया था।

अब उसके बाद मेरे नाटक ‘‘इमाम-ए-हिंद: राम’’ की बारी आई। चूंकि वह इस नाटक को निर्दशित करने के बेहद इच्छुक थे इसलिए मैं ने उन्हें यह नाटक उनकी दोस्त मंडली के बीच एक दिन पढ़ कर सुनाया जिसमें उनकी फिल्म में काम करने वाले कुछ ऐक्टर और टेक्निशियंस भी शामिल थे। उन सभों ने मेरे नाटक को दिल खोल कर सराहा और दाद दिया और अंत में अपने कुछ अमूल्य सुझाव भी दिए जो स्वागत योग्य थे। मगर मेरे पुरस्कृत उपन्यास की फिल्मी दुर्दशा देखने के बाद मेरे दिल ने फिर यह गवार नहीं किया कि दुबारा अपनी कोई मूल्यवान रचना उनके हाथ में उसे एक बार फिर तबाह करने के लिए दूं। और मैं ने स्वयं को न चाहते हुए भी उनसे इस प्रोजेक्ट को ले कर अलग कर लिया।

अब क्या था। वह इस मौके की तलाश में पड़ गए कि किसी अपने अन्य लेखक मित्र से रामायण को बुनियाद बना कर कोई दूसरा नाटक लिखवा कर प्रस्तुत कर डालें और यह सब काम इतनी जल्दी हो कि मेरे नाटक से पहले स्टेज पर आ जाए। जिसमें वह किसी हद तक कामयाब भी रहे। यह अलग बात है कि उनका नाटक कोई पूर्णकालिक नाटक नहीं, बल्कि दास्तानवी अंदाज में लिखी हुई एक छोटी सी प्रस्तुति है।

उर्दू में वाल्मीकि रामायण को आधार बना कर जो पहला नाटक अब तक के इतिहास में लिखा गया है वह सौभाग्य से मेरा नाटक ‘‘इमाम-ए-हिंदः राम’’ ही है।

मेरे संवादों और सीन का प्रयोग करना तो लेखक और निर्देशक दोनों के लिए संभव नहीं था क्योंकि मेरा नाटक भारतीय कॉपीराइट नियम के अधीन पूर्ण से पंजीकृत है और मेरी इजाज़त के बिना इसका किसी के लिए भी उसका एक शब्द भी इस्तेमाल करना संभव नहीं है। लेकिन अब प्रस्तुति शैली और क्लासिकी गीतों पर तो कॉपीराइट की बंदिश नहीं है, लिहाजा इस छूट का उन दोनों ने फ़ायदा उठाने की कोशिश जरूर की। न चाहते हुए भी उपशिर्षक के तौर पर अपनी दास्तानवी प्रस्तुति के साथ इमामे हिंद भी जोड़ दिया।

अब अल्लाम इक़बाल पर तो किसी की कॉपीराइट नहीं है। लिहाज़ा हर कोई उनकी नज़्म ‘‘राम’’ को इस्तेमाल करने के लिए आज़ाद है। मगर नाटक के नाम के तौर पर मेरे नाटक की कॉपी इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि यह नाम मेरे द्वारा भारत सरकार एवं मुंबई राइटर्स एसोसिएशन दोनों जगह से पंजीकृत है और इसकी अवहेलना करने पर कानूनी कारवाई की जा सकती है।

अभी कल की ही ख़बर है। एक अंग्रेजी लेखिका महोदया ने इससे मिलता जुलता अपने एक अन्य कार्यक्रम का नाम भी रख डाला यानी ‘राम-ए-हिंद’’। गोया राम केवल हिंद के थे, बाकी दुनिया से उनका कोई तअल्लुक़ ही नहीं था।

यहां बात मैं तीन दिवसीय ‘‘तफ़रीह थियेटर फेस्टिवल’’ की कर रहा था मगर बात कहीं और चली गई। हालांकि इसका प्रसंग मेरे नाटक ‘‘इमाम-ए-हिंद: राम’’ से ही जुड़ा हुआ है।

वहां मुझ से इस विषय पर विशेष रूप से बातचीत की गई कि इस नाटक को लिखने की प्रेरणा कब कैसे और कहां मिली। इसे पूरा करने का तरीक़ा क्या रहा और इसे मुकम्मल करने में कितना समय लगा। तो अपने पाठकों को बता दूं कि पूरे तीन साल की अनथक मेहनत के बाद मैं ने इसके शोध और लेखन का कार्य संपन्न किया। इसके विषय विशेषज्ञ हिंदी के प्रसिद्ध लेखक एवं विद्धान प्रोफेसर अब्दुल बिस्मिल्लाह हैं जिन्होंने अपने पहले पाठ में ही इसे न केवल बेहद पसंद किया बल्कि मेरे आग्रह पर संस्कृत में लिखित मूल वाल्मीकि रामायण को सामने रख कर इसके एक एक संवाद एवं कथा प्रसंग को बड़ी गहराई और मेहनत से सत्यापित भी किया है। जिसके लिए मैं हमेशा उनका दिल से शुक्रगुजार रहूंगा।

फेस्टिवल में बातचीत के दौरान मुझ से यह भी पूछा गया कि इस नाटक को लिखते वक़्त एक मुसलमान लेखक होने के नाते कोई डर का भाव तो मेरे दिल कभी नहीं आया क्योंकि आज के इस अति राष्ट्रªवादी और धर्मवादी माहौल में बहुसंख्यक समाज की ओर से किसी भी प्रकार की अच्छी या बुरी प्रतिक्रिया आने की पूरी संभावना थी। मगर मुझे बेहद खुशी है इस बात की कि इस नाटक के प्रोडयुसर श्री अतुल गंगवार जी जो कि एक वरिष्ठ पत्रकार एवं पटकथा लेखक हैं, अपने पहले ही पाठ में इसे बेहद पसंद किया। अपने चंद एक क़रीबी दोस्तों से भी पढ़वाया ताकि इसको प्रकाशित एवं स्टेज पर प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदारी लेने से पहले पूरी तरह वह आश्वस्त हो जाएं कि नाटक एक उच्च कोटि की कृति है या नहीं और उसको लेकर कोई विवाद तो खड़ा नहीं हो जाएगा।

मगर मुझे ख़ुशी है कि ऐसा कुछ विवाद खड़ा नहीं हुआ और अब पुस्तकाकार रूप में आने के बाद एक मंझे हुए और संगीत नाटक अकादमी द्वारा पुरस्कृत निर्देशक श्री मुशताक़ काक के द्वारा इसे अगामी दिसंबर महीने में पूरी उम्मीद है कि दिल्ली में पहली बार स्टेज पर प्रस्तुत भी किया जाएगा।

फेस्टिवल में बातचीत के दौरान मुझ से यह भी पूछा गया कि रचनात्मकता एवं अपनी रोजी रोटी के बीच मैं तादात्मय कैसे बिठा पाता हूं। आम तौर पर लेखकों का आर्थिक शोषण ही अधिक होता देखा गया है तो आप अपने को इस शोषण से किस प्रकार बचा पाते हैं। जवाब स्वरूप मैं ने कहा कि दुनिया का शायद ही कोई लेखक हो जिसका किसी न किसी रूप में प्रोडयुसरों एवं प्रकाशकों के द्वारा कभी न कभी शोषण न किया गया हो, मगर जब अनुभव की भट्टी में एक बार इंसान पूरी तरह पक जाता है तो फिर उसका शोषण करना असंभव सा हो जाता है। और लेखकों को चाहिए कि वह अपनी अहमीयत और मूल्य को समझें और बिना लाग लपेट के अपनी रचना का मोल भाव तय कर के पूरी कीमत वसूल करें। जरा भी रियात करने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि प्रोडयुसर और प्रकाशक अपनी कमाई में बहुत छोटा सा भाग ही लेखकों के साथ साझा करते हैं इसलिए उनके साथ मानदेय को लेकर एक स्पष्ट एवं सीधा व्यवहार अपनाया जाना चाहिए। कोई झिझक अख़्तियार करने की क़तई ज़रूरत नहीं है। तभी आप शोषण से बच सकते हैं।

अंत में वहां दास्तानगोई का लुत्फ़ उठाया और उर्दू के प्रसिद्ध व्यंग लेखक, पतरस बुख़ारी की एक कृति ‘‘साइकिल ‘‘ से भी लुत्फ़ंदोज़ हुआ जिसे बड़ी निपुणता से दो कलाकारों श्री अज़हर इक़बाल और साहिल आग़ा ख़ान के द्वारा प्रस्तुत किया गया।

मेरे साथ ‘‘लेखकों से संवाद कार्यक्रम’’ में जो अन्य रचनाकार शामिल थे और जिस संवाद का नाम ‘‘लेखक कारख़ाना’’ दिया गया था, वे लोग थे, मनीषा पांडेय, विकास बाहरी और आस्था मित्तल। और इसका बड़े सुंदर ढ़ंग से संचालन किया अंकिता आनंद ने।

मैं इन सभी लोगों का दिल से शुक्रगुज़ार हूं। आपका भी धन्यवाद कि आपने बड़े धैर्य से मेरे इस लंबे लेख को पढ़ने का कष्ट किया।

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