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मातृत्व को विशाल रूप देने से जीवन में बैठता है सामंजस्य – सुमित्रा महाजन

नई दिल्ली|  उनका जन्म 06 जुलाई, 1905 में नागपुर में  हुआ। जन्म के समय मौजूद परिवार के शुभचिंतक डॉक्टर श्री दादा परांजपे ने अनुभव किया कि कन्या-रत्न के मुखमंडल से दिव्य आभा फूट रही है, लिहाज़ा उन्होंने सुझाव दिया कि बेटी का नाम कमल रखा जाए, तो अच्छा रहेगा। परिवार ने यह सुझाव मान भी लिया। इस तरह श्रीमती यशोदाबाई की गोद में रक्ताभ कोमल कमल खिल गया।

लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने  आज कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का नाम लिए बिना बताया कि उन्होंने देश के एक बड़े नेता को पत्र लिखकर उनके बयान का जवाब दिया था कि, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में महिलों के जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि महिलाओं के लिए राष्ट्र सेविका समिति है”। मालूम हो की कुछ महीने पहले राहुल गांधी ने कहा था की संघ में महिलाओं में क्यों नहीं जाती और निक्कर क्यों नहीं पहनती। सुमित्रा महाजन ने कहा कि बचपन से राष्ट्र सेविका समिति की सेविका रही हैं और लेकिन इस बयान से उन्हें दुःख पहुंचा लेकिन सार्वजनिक रूप से बयान नहीं दे सकती थीं क्योंकि लोकसभा स्पीकर होने की मर्यादा आढे आती थी। इसलिए अपने विचार और पद की गरिमा में सामंजस्य बैठाने के लिए उन्होंने एक पत्र लिखकर बयान देने वाले नेता तक पहुँचाया साथ ही समिति के परिचय की एक पुस्तिका भी उन्हें भिजवाई।

सुमित्रा महाजन आज दिल्ली में राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापक स्वर्गीय श्रीमती लक्ष्मी बाई केलकर के जयंती समारोह में स्त्री जीवन के विभिन्न आयामों में सामंजस्य विषय पर विषय पर बोल रही थी उन्होंने कहा कि हर स्त्री में अनेक शक्तियां होती हैं वह बहुत कुछ कर सकती हैं। उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन और राष्ट्र जीवन में सामंजस्य बैठना है। उन्होंने यह भी बताया कि समिति की सेविका होने के नाते वो लोकसभा स्पीकर के पद का दायित्व बहुत अच्छे से निभा पा रही हैं क्योंकि समिति ने उन्हें मातृत्व को विशाल करना सिखाया। उन्होंने कहा कि स्पीकर की कुर्सी पर बैठकर वो सबके बारे में सोचती हैं, क्योंकि हर पार्टी का अपना एक विचार है, अपनी एक लाइन है और अपनी पार्टी से उन्हें जो निर्देश मिलता है उसपर चलना उनकी मजबूरी है। लेकिन जब मातृत्व विशाल हो जाता है तो वो सबकी मजबूरी समझता है और यह भी सामंजस्य है। सुमित्रा महाजन ने सभागार में उपस्थित सभी महिलाओं से अनुरोध किया कि वे लक्ष्मी बाई केलकर से प्रेरणा लेते हुए अपने परिवार समाज और राष्ट्र में सामंजस्य बैठाएं और यथाशक्ति योगदान दें।

राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख डॉ। शरद रेनू ने कहा की कोई भी व्यक्ति तभी आनंद की अनुभूति कर सकता है जबकि परिवार और समाज में आनंद हो। उन्होंने कहा कि भारत में एक व्यक्ति विशेष नहीं होता पूरा समूह और समाज विशेष होता है, समाज के और देश के मूल चिंतन के आधार पर ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है। भारतीय समाज में राष्ट्र का केंद्र बिंदु परिवार है और परिवार का केंद्र बिंदु स्त्री है, स्त्री ही परिवार समाज और राष्ट्र को चलाती है उसका मातृत्व जब विशाल होता है तो वसुधैव कुटुम्बम की धारणा साकार होती है।

स्वर्गीय लक्ष्मी बाई केलकर के जयंती समारोह में पंजाब केसरी की चेयर पर्सन श्रीमती किरण चोपड़ा और हरियाना की बी।पी।एस।एम यूनिवर्सिटी की वाईस चांसलर श्रीमती सुषमा यादव का उनकी उपलब्धियों के लिए अभिनन्दन किया गया।

राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापक और आद्य प्रमुख संचालिका श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर को प्यार और असीम श्रद्धा से हम वंदनीया मौसी जी के उपनाम से जानते हैं। मौसी यानी मां जैसी थीं । उनका जन्म 06 जुलाई, 1905 में नागपुर में  हुआ। बचपन से ही वो आम बच्चों से भिन्न थीं और उन्होंने महिलाओं के भीतर छुपीं शक्तियों को उस समय पहचाना जब नारी सशक्तिकरण की धारणा से कोई परिचित भी नहीं था। 25 अक्टूबर 19 36 को उन्होंने महिलाओं के ऐसे संगठन की नींव रखी जो व्यक्ति निर्माण के साथ समाज और राष्ट्र के निर्माण में भी योगदान दे।

राष्ट्र सेविका समिति भारतीय महिलाओं का सबसे बड़ा और सुदृढ़ संगठन है। जिसकी शाखाएं पूरे भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी फैली हुई हैं। भारत के 2380 शहरों, कस्बों और गांवों में समिति की 2784 शाखाएं चल रही हैं। दुनिया के 16 देशों में समिति की सशक्त उपस्थिति दर्ज हो चुकी है। सेविका समिति सामाजिक सांस्कृतिक और बौद्धिक धरातल पर 1936 से काम कर रही है। शाखाओं के माध्यम से समिति की सेविकाएं (सदस्या) समाज और देश के समग्र विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

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