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पीओके कैसे वापस लेना है, यह हो चर्चाओं का विषय – डॉ. जितेन्द्र सिंह

नई दिल्ली, 20 जनवरी। पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर सरस त्रिपाठी की प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक “कश्मीर में आतंकवाद (आँखों देखा सच)” कॉन्स्टीट्यूाशन क्लब में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह द्वारा लोकार्पित की गयी । भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि एवं पूर्व उप सेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल नरेंद्र सिंह मुख्य वक्ता के तौर पर उपस्थित थे।


पुस्तक के लेखक मेजर सरस त्रिपाठी ने पुस्तक का परिचय देते हुए कहा कि कश्मीर के बारे में बहुत सी बातें शेष भारत में आज भी अस्पष्ट हैं और शेष भारत के बारे में कश्मीर में भी अस्पष्टता कायम है। भारत के बारे गलत जानकारियां कश्मीरी अवाम को बताई गयीं हैं इस कारण वो भारत को अपने से अलग देश मानने लगे हैं। वास्तव में कश्मीर घाटी पूरे जम्मू-कश्मीर राज्य का 1/6 प्रतिशत का छोटा सा भाग है, जहाँ अलगाववादियों के कारण आतंकवाद की समस्या है। लेकिन देश दुनिया में मीडिया द्वारा जो दिखाया जाता है, वही हमें दिखाई देता है वही वही प्रभावी भी बन जाता है। उन्होंने बताया कि जम्मू-कश्मीर में उनके सैनिक जीवन के उनके अपने अनुभव पर पर यह पुस्तक आधारित है। जिसमें जम्मू कश्मीर में आतंकवादी विरोधी उनके 12 अभियान जो आर्मी के रिकॉर्ड में भी हैं उन्हें शामिल किया है। जम्मू-कश्मीर के विषय में आई।एस।आई। की क्या भूमिका है, पाकिस्तान सरकार, अलगाववादियों की कश्मीर में भूमिका इसके बारे में तथ्यपरक वर्णन इसमें किया गया है। कश्मीर में एक सन्दर्भ देते हुए उन्होंने बताया कि कश्मीर के लोग ताकतवर की ओर तथा जो उनके लिए आर्थिक दृष्टि से अधिक अनुकूल होता है उनकी तरफ जाते हैं। यह ध्यान में रखते हुए हमें अपनी ताकत बढानी होगी। लेकिन भारत ने वहां अपनी सैन्य ताकत ज्यादा नहीं दिखाई दिखाई है। नक़्शे में कश्मीर भारत के मस्तक की तरह है, और हम अपना मस्तक किसी को नहीं दे सकते।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता ले। जनरल नरेन्द्र सिंह ने बताया कि उस समय कश्मीर में आतकवाद चरम सीमा पर था, उस समय लेखक ने एक युवा सैनिक के रूप में वहां परिस्थिति को लम्बे समय तक नजदीक से देखा-समझा और अनुभव किया इसको शब्दों में यह पुस्तक हमें रूबरू कराती है। उन्होंने कश्मीर में सेना के सैनिक के कठिन जीवन और कश्मीर के नागरिकों के भाव को इसमें प्रकट किया हैं, जिसमें दुर्दांत आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ों की कहानियाँ हैं । सैनिकों के सफल ऑपरेशन, उनकी वीरगति पर सैनिकों के दर्द, अलगाववादी कैसे आम नागरिकों की भावनाओं से खिलवाड़ करके अपना आर्थिक और राजनीतिक हित साध कर आम कश्मीरी नागरिक के खून की होली खेल रहे हैं इसका सुविस्तार तथ्यपूर्ण, भावनात्मक चित्रण लेखक ने किया है।
उन्होंने बताया कि वास्तविक धरातल पर कश्मीर को जानने के लिए खासकर तथाकतिथ बुद्धिजीवियों को तो अवश्य यह पढनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सबसे पहले यह देश को मानना है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, इसकी पहाड़ियां हमारे देश की सुरक्षा के लिए जरूरी हैं सामरिक दृष्टि से यह भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योकि तीन देशों के साथ जम्मू-कश्मीर की सीमा लगती है। उन्होंने कश्मीर के वर्तमान परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अलगाववादियों तथा उससे उपजे आतकवादियों के लिए आजादी के नाम पर कश्मीर एक फाइनेंशल बैटल बन गया है। सेना द्वरा चिन्हित कई आतंकवादियों का पता करने पर यह देखा गया है कि वह दिल्ली, कलकत्ता जैसे शहरों में आतंकवाद से प्राप्त धन से अपना बिजनेस चला कर आनंदपूर्वक जीवन जी रहे हैं। उनको देखकर वहां के भटके हुए युवा भी अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए एक बिजनेस के रूप में आतंकवाद को अपना रहे हैं। उनके मन में आजादी के भाव से ज्यादा अर्थ का भाव ज्यादा है। राज्य में बढ़ रहे रियल सैक्टर, पर्यटन एवं वित्तीय गतिविधियां इसका प्रमाण है। इसको रोकने के लिए हमें हुर्रियत की वित्तीय मदद के स्रोत बंद करने होंगे तथा और सर्जिकल स्ट्राइकों के लिए भी तैयार रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि कश्मीरी हिन्दुओं का वहां पुनर्वास करने में समय लगेगा किन्तु हम उनको उनकी मातृभूमि की ओर से वोट का अधिकार तो दे ही सकते है।

डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि में। सरस त्रिपाठी ने इसे कथात्मक शैली में लिखा है जिसे तथ्यात्मक के साथ भावात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। कश्मीर जटिल विषय इसलिए है क्योंकि यह दुनिया का अकेला ऐसा विवादित क्षेत्र है जहां जीतती हुई फ़ौज पीछे हटती है, ताकतवर पक्ष पीड़ित होता है। जीतती हुई सेना खुद सीज फायर करती है। हुर्रियत के नेता सियासत की बातें करते हैं लेकिन हकीकत में वह पैसे लेकर आजादी के नाम पर लोगों को भ्रमित कर अपना बिजनेस करते हैं। आजादी की लड़ाई के नाम पर वहां पाकिस्तान या आईएसआईएस का झंडा दिखता है कश्मीर का नहीं। वहां आतकवादी घटनाओं में किसी हुर्रियत नेता का बच्चा नहीं मारा गया। इस्लामी पहचान को लेकर बना पाकिस्तान जो कहता है कश्मीर ले के रहेंगे, उसे यह सोचना चाहिए उससे बांग्लादेश संभला क्या, बलूचिस्तान संभल रहा है? नार्थ वेस्ट फ्रंटियर संभल रहा है? तब भी कश्मीरियों को भ्रम में रख कर पाकिस्तान उनका खून बहा रहा है। कश्मीरियों को इस सन्दर्भ में जागरूक करने की आवश्यकता है। भारत और पाकिस्तान दोनों साथ ही स्वतंत्र हुए थे लेकिन आज भारत कहाँ है ओर पाकिस्तान कहाँ है। आज पेप्सी, माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ भारत के हैं, दूसरी और दुनिया का सबसे वांछित आतंकी ओसामा पाकिस्तान में पाया जाता है। भारत ने जहाँ विज्ञान, टेक्नोलोजी में नाम कमाया है दूसरी और पाकिस्तान ने आतंकवाद में नाम कमाया है। कश्मीर में भी एक बदलाव का माहोल बन रहा है, दहशत के तिजारतियों का नकाब उतर रहा है। कश्मीरियत वो है जिसमें हजरतबल भी है और अमरनाथ भी हैं।

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने बताया कि एक पूर्व सैनिक के अनुभवों पर आधारित होना इस पुस्तक की विशेषता है। जिसने कश्मीर की धरती पर वहां का वास्तविक चित्र देखा, सहा, झेला इसकिये यह पुस्तक इस विषय पर अधिक प्रमाणिक है। कश्मीर के विषय पर सैनिकों के जो विवरण मिलते हैं उसको अधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है, बजाए कि बुद्धिजीवियों के जो कुछ दिन के कश्मीर प्रवास के आधार पर पुस्तक देते हैं। वहां के दुर्गम आतंक प्रभावित इलाकों गश्त कर रहे सैनिक को पता नहीं चलता कब उसके साथ क्या हो जाए, सैनिकों के ऐसे कठिन जीवन को भी पुस्तक में बताया गया है, इसके लिए लेखक बधाई के पात्र हैं। उन्होंने कहा कि कई वर्षों से हम इस विषय पर उसी चर्चा में उलझे हुए हैं जो हमसे करवाई जा रही है। जबकि महाराजा हरिसिंह ने वैसे जी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये थे जैसे अन्य रियासतों के राजाओं ने किये। जो जम्मू कश्मीर महाराजा हरिसिंह सौंप कर गए थे उसका आधा हिस्सा भी भारत के पास नहीं है, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसको मुद्दा बनाना चाहिए । 70 साल से जो हिस्सा जम्मू कश्मीर का पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है उसे कैसे वापस लेना है, इस इस पर चर्चा होनी चाहिए। कोई भी बुद्धीजीवी ऐसी बात नहीं करे जिससे सेना का मनोबल गिरता हो। अंत में पुनः बताया कि अगली बार कश्मीर पर आधारित सम्मलेन का विषय पाक अधिकृत कश्मीर को कैसे वापस लिया जाए” यह होना चाहिए।

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