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हिंदी का संदेश… डॉ धनेश द्विवेदी

डॉ धनेश द्विवेदी

हिंदी माह के दौरान किसी ने यूं ही हिंदी से पूछ लिया कि तुम तो पूरे देश की संपर्क भाषा हो, कैसा लगता है तुम्‍हें ? सवाल सुन हिंदी मुस्कुराई, थोड़ा शर्माई और लजाते हुए बोली, धत्त ! भारत वेद, पुराण, उपनिषदों वाली संस्कृति के साथ-साथ बौद्धिक संपन्‍नता और पुरातन सभ्यता का देश है। यहां संपर्क नहीं, संवाद होता है और मुझे गर्व है कि मैं सदियों से संवाद की भाषा के रूप में स्थापित हूं। संपर्क एक परदेशी व्‍यवस्‍था है और इसकी प्रकृति चलायमान होती है, आज इसके साथ तो कल उसके साथ, किंतु संवाद स्थिरता और तटस्‍थता का द्योतक है। भारत के अंदर किसी भी धर्म, जाति के लोग हों, संवाद में मेरा उपयोग कर एकता की मिसाल कायम करते हैं। कभी मैं भक्ति भावना का आधार बनी तो कभी स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य स्तंभ। अरे भाई ! भारतीय समाज की आत्मा में बसने वाले राम और कृष्ण की जन्मभूमि से कर्मभूमि तक में मैं शामिल रही। पुरातन काल में जब किसी को व्यापार में सफलता पानी होती थी तो वह हिंदी भाषा के साथ ही आगे बढ़ता था और वक्त जब घूम कर वापस आया तो आज लोग देख रहे हैं कि बड़े-बड़े व्यापारिक समूह हिंदी का उपयोग कर अपने व्यापार को गति दे रहे हैं। न जाने कितने ही कलमकारों ने मेरे माध्‍यम से समाज को आइना दिखाने का काम किया है। यह संवाद भाषा होने का परिणाम ही है कि आज मेरा परचम देश ही नहीं विदेशों में भी शान से लहरा रहा है। हां, मैं अपने उपयोगकर्ताओं को यह संदेश जरूर देना चाहूंगी कि मेरे नाम पर भेदभाव न करें, मेरी भारत की किसी दूसरी भाषा से प्रतिस्पर्धा न रखें। मेरा उपयोग सरल रूप से करें ताकि जनमानस में संवाद की भाषा के रूप में मेरी स्थिति और मजबूत हो। यह भी मानकर चलिए कि मैं सशक्‍त और समृद्ध हुई तो देश की शान में भी वृद्धि ही होगी।
आप सभी को मेरे यानि हिंदी दिवस की बहुत बधाई !

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