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उत्तराखंड के नदी नाले एक वजह हैं गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण के लिए

उत्तराखंड की छोटी छोटी नदी नाले गाड़ गदेरे भी एक वजह हैं गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण के लिए | गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक गंगा में सैकड़ों नदी नाले गाड़ गदेरे गंगा नदी में मिलते है।।
दरअसल इन गाड़ गदेरों की लंबाई 5 से 25 किलोमीटर तक है और इन गाड़ गदेरों के बहाव वाले क्षेत्रों के दोनों छोर पर पहाड़ के गाँव बस्तिया बसी है।। इन्ही के किनारों पर इनकी खेती बाड़ी रहती है,,इन गाड़ गदेरों से इन्हें पीने का पानी, सिंचाई का पानी व जरूरत का बजरी पत्थर घास लकड़ी, मांस मछली भी आसानी से उपलब्ध होती है..यों कहें कि ये गाड़ गदने पहाड़ की लाइफ लाइन हैं तो ज्यादा बेहतर होगा…बिडम्बना ये है कि ये लाइफ लाइन गाड़ गदेरों में इन क्षेत्रों के लोग वर्ष भर अपना कूड़ा कचरा प्लास्टिक व मृत जानवरों को भी इन्ही नदी नालो में डालते हैं।

वर्ष के 10 महीनों में ये गाड़ गदेरे नदी नाले खाले कूड़ा कचरा प्लास्टिक से लबालब भर जाते हैं…बरसात के 40 दिनों में गाड़ गदेरे भी उफान पर होते हैं जो तमाम कूड़ा कचरा बहाकर गंगा में उड़ेल देते हैं।इन्ही में से ये एक है उत्तरकाशी से लगा कोटि नाला,, जो समस्त कूड़े कचरे प्लास्टिक को गंगा नदी में उड़ेल रहा है।गंगा विचार मंच के नाते हमने भारत सरकार के गंगा संरक्षण मंत्रालय के साथ कई बार की बैठकों में प्रदेश संयोजक की हैसियत से ये सुझाव गंगा संरक्षण मंत्रालय की दिया है कि इन गाड़ गदेरों का उपचार को भी नमामि गंगे कार्यक्रम में शामिल कर लिया जाय तो गंगा का आधा प्रदूषण खत्म हो जाएगा।।।।

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