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गोरखपुर हादसा : जिलाधिकारी ने शासन को भेजी रिपोर्ट, प्राचार्य सहित कई डॉक्टर दोषी, हर कदम पर हुई लापरवाही

बीते 10 अगस्त की रात गोरखपुर मेडिकल कालेज में हुई मासूमों की मौत की कहानी तो दो दिन पहले ही लिखी जा चुकी थी। दरअसल ऑक्सीजन उपलब्धता का चेतावनी बिन्दु तो आठ अगस्त को ही पार हो चुका था किन्तु मेडिकल कालेज प्रशासन ने सिलेंडर मंगवाए ही नहीं। जिलाधिकारी राजीव रौतेला की शासन को भेजी रिपोर्ट को मानें तो यदि तब अधिकारी चेत जाते तो इतने नौनिहालों की जान नहीं जाती। इस रिपोर्ट में प्राचार्य सहित कई डॉक्टर तो दोषी पाए ही गए हैं, सामूहिक आपराधिक षडयंत्र जैसी स्थितियां भी सामने आ रही हैं।

जिलाधिकारी राजीव रौतेला ने अपनी रिपोर्ट में कालेज के प्राचार्य समेत आधा दर्जन डाक्टरों और चार कर्मचारियों के अलावा आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी को इस पूरे मामले में दोषी बताया है। वहीँ मक्खियों से भरे संघन चिकित्सा कक्ष में सैकड़ों बच्चे अब भी आक्सीजन लगी पाइपों से जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पड़ताल में 10 अगस्त की रात को घटी घटना के मामले में चौंका देने वाले तथ्य सामने आये हैं। यह बात अब पूरी तरह से साबित हो चुकी है कि अगर मेडिकल कालेज का प्रशासन चाहता तो इन मौतों को रोका जा सकता था। डॉक्टरों से लेकर कर्मचारियों तक ने इस मामले में घोर लापरवाही की। जिस तरह सभी ने मिलकर इस काम को अंजाम दिया, इसे आपराधिक षडयंत्र माना जा रहा है।

आपस में संवाद ही नहीं

जिलाधिकारी की रिपोर्ट के मुताबिक तत्कालीन प्राचार्य डॉ. राजीव मिश्रा का अपने ही स्टाफ व सहयोगी डॉक्टर्स पर कोई प्रभाव नहीं है। प्राचार्य को सब पता होने के बाद भी ऑक्सीजन सप्लाई सुचारू रहे इसके लिए कोई पहल नहीं की गई। विभागाध्यक्ष डॉ. महिमा मित्तल समेत बाल रोग विभाग के डाक्टरों के बीच संवाद न होने की बात भी कही गई है।

डॉ.सतीश कुमार भी दोषी

रिपोर्ट के अनुसार ऑक्सीजन की सप्लाई की सुनिश्चितता एनेस्थीशिया विभागाध्यक्ष डॉ.सतीश कुमार के जिम्मे थी। वे ऑक्सीजन की उपलब्धता सम्बंधित व स्टॉक आदि के प्रभारी थे। लेकिन इन्होंने कभी भी स्टॉक रजिस्टर या लॉग बुक चेक करने की जहमत तक नहीं उठाई। पूरे देश की निगाहें मेडिकल कॉलेज में थी तो वह बिना किसी आधिकारिक सूचना के मुंबई 11 अगस्त को चले गए।

ओवरराइटिंग भी पकड़ी

आक्सीजन की उपलब्धता, लॉग बुक और स्टाक बुक का जिम्मा कालेज के चीफ फार्मासिस्ट गजानन जायसवाल पर था। लॉग बुक व स्टॉक बुक में अनियमित इंट्री मिली है। कई जगह आंकड़ों में बाजीगरी दिखाने के लिए ओवरराइटिंग भी हुई है। इनके अलावा पुष्पा सेल्स प्रबंधन को भी जिम्मेदार माना गया है। कहा गया है कि ऑक्सीजन जीवनरक्षक है। इसकी आपूर्ति बंद करना गुनाह है।

लेखा विभाग भी मिला लिप्त

लेखाविभाग भी मौत के मंजर की पटकथा लिखने में अहम सहयोग का गुनाहगार है। कार्यालय सहायक उदय प्रताप शर्मा, लिपिक संजय कुमार त्रिपाठी व सहायक लेखाकार सुधीर कुमार पांडेय पर आरोप है कि जब शासन से बजट आया तो प्राचार्य को बताने में लेटलतीफी की गयी। माना जा रहा है कि गैस आपूर्ति में कमीशन की नींव भी यहीं पड़ी।

आपूर्ति की समानांतर व्यवस्था

बीआरडी मेडिकल कालेज में आक्सीजनकी दो समानांतर व्यवस्थाएं की गयी हैं। एक नौ हजार लीटर के टैंक में लिक्विड ऑक्सीजन आती है, वहीं सिलेंडर ऑक्सीजन की यूनिटम में भी एक टैंक है। लिक्विड ऑक्सीन आपूर्ति का जिम्मा दोषी मानी जा रही पुष्पा सेल्स का था, वहीं सिलेंडर ऑक्सीजन की आपूर्ति फैजाबाद की इंपीरियल गैसेज के माध्यम से होती थी। कालेज में एक महीने में तीन से चार टैंकर लिक्विड आक्सीजन और तकरीबन 100 सिलेंडर की रोजाना खपत होती है और दोनों ही यूनिट्स को एक साथ चलाया जाता है।

जानबूझ कर नहीं किये इंतजाम

10 अगस्त की सुबह 11 बजे लिक्विड आक्सीजन की यूनिट में तक़रीबन 900 यूनिट आक्सीजन शेष था। इसके बावजूद पुख्ता इंतजाम नहीं किये गए और शाम 7.30 बजे लिक्विड आक्सीजन पूरी तरह से ख़त्म हो गई। खतरनाक यह हुआ कि ठीक उसी वक्त सिलेंडर यूनिट में भी आक्सीजन का प्रेशर जाता रहा। नतीजा मासूमों की मौत के तौर पर सामने आया । कर्मचारी कहते हैं कि अगर इम्पीरियल को फोन करके एक दिन पहले ही अतिरिक्त आक्सीजन सिलेंडर मांगा लिए गए होते तो यह घटना कभी न घटती।

-ऋषभ अरोड़ा

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