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गीता की कीमत का नहीं, ज्ञान का विरोध कर रहे हैं कुछ नासमझ

गीता हमारे देश की शान है, पहचान है। यह जीवनदर्शन और सांसारिक ज्ञान का अनमोल खजाना है। इसका हर रूप आत्मिक सुकून और मानसिक शक्ति बांटता है, और जीवन से नकारात्मकता को खत्म करता है। हमारे बीच के कुछ नासमझ स्वार्थवश इस पर टिप्पणी कर रहे हैं जो दुर्भाग्यपूर्ण है।

अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव विश्व स्तर पर हरियाणा का नाम पहुंचा रहा है और गीता का ज्ञान सर्वत्र फैला रहा है। उस अवसर पर देश के राष्ट्रपति, हमारे राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्रीगण, विश्व सुंदरी व हरियाणा की बेटी मानुषि छिल्लर समेत कई गणमान्य लोगों को यादगार के रूप में गीता का एक सुन्दर रूप भेंट किया गया जिसमें फलों,पत्तियों से बनी प्राकृतिक स्याही इस्तेमाल हुई है और ये आला दर्जे की कलाकारी का नमूना है। भेंट की गई गीता ना सिर्फ प्राकृतिक वस्तुओं की महत्वता पर जोर देती है बल्कि गुणवत्ता के उच्च मापदंड स्थापित करने वाली कलाकारी को भी सम्मान देती है। इसमें ज्ञान, नैसर्गिकता और कलाकारी का शानदार मिश्रण है और यह गीता महोत्सव के अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप की शोभा के बिल्कुल अनुरूप है। बरसों बाद भी राष्ट्रपति भवन आदि में कोई जब गीता के इस स्वरूप को देखेगा तो याद करेगा कि हरियाणा के लोग कैसे गीता के ज्ञान, प्रकृति और कला को सम्मान देते हैं।

लेकिन ये सब अज्ञान में डूबे विपक्ष को समझ नहीं होता। खुद विलासिता, मितव्यय, भ्रष्टाचार, दिखावे के आदी रहे ये नासमझ ना गीता को समझते हैं, ना कला की कीमत को।हम उनकी सीमाएं और फितरत समझते हैं। धीरे-धीरे हरियाणा के लोग भी समझने लगे हैं |

गीता की सभी प्रतियां पूरी तरह पारदर्शी तरीके से यथासंभव छूट के साथ खरीदी गई और इस प्रक्रिया में ना एक रूपये का भी भ्रष्टाचार हुआ, ना ही कोई प्रति किसी अयोग्य व्यक्ति के घर गई।क्या यह गीता कही से इससे कम क़ीमत पर उपलब्ध है जिसका ऊपर विवरण किया गया है, क्या देश के प्रमुख को पहली बार सम्मान हेतू इस मूल्य का कोई उपहार मिला है ।ईश्वर उन सबको सद्बुद्धि दे जो अनजाने में गीता को भी धूमिल करने का विफल प्रयास कर रहे हैं।

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