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क्या है गीतांजलि के लिए गुरूदेव को नोबल मिलने की कहानी- शरत सांकृत्यायन

शरत सांकृत्यायन

रविन्द्रनाथ टैगोर की जयंती पर दिनभर सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलियों का दौर जारी रहा….साथ ही उनके द्वारा रचित भारत के राष्ट्रगान जनगनमन के लिए भी और उनकी रचना गीतांजलि के लिए भी उनको बार बार याद किया गया। टैगोर भारतीय साहित्य जगत के चमकते सितारे हैं और उन्होंने ही देश को पहला नोबेल भी दिलवाया। बांग्ला और अंग्रेजी में उन्होंने उत्कृष्ट साहित्य की रचना की है। गीतांजलि भी उनमें से एक है। गीतांजलि एक खूबसूरत काव्य संग्रह है लेकिन साहित्य के जानकारों का मानना है कि ये रचना इतनी भी खास नहीं है कि इसे नोबेल पुरस्कार मिल जाए। तो सवाल यह उठता है कि ऐसी क्या खास बात थी कि तब नोबेल पुरस्कार समिति के अध्यक्ष ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने अपने गुलाम देश के एक कवि और उसकी एक साधारण सी रचना को इस पुरस्कार के लिए चुना। इसके पीछे की कहानी जो बतायी जाती है वह न सिर्फ काफी दिलचस्प है बल्कि जनगनमन की रचना से भी जुड़ी है।
1911 में अंग्रेजों ने कलकत्ता से हटाकर दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया और इस अवसर पर आयोजित भव्य समारोह में भाग लेने के लिए इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम को भारत आमंत्रित किया। कहा जाता है कि रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि वे राजा की शान में एक खूबसूरत गीत लिखें। उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की भी सहानुभूति अंग्रेजों के प्रति थी।
तो अपने भाई और बहनोई के दबाव में रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल हैं “जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता”। इस गीत के एक एक शब्द में राजा जॉर्ज पंचम का गुणगान टपकता है। राष्ट्रगान को ध्यान से समझा जाए तो इसका अर्थ कुछ इस तरह से होता है “भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महाराष्ट्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदियां जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित हैं, खुश हैं, प्रसन्न हैं , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते हैं और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते हैं। तुम्हारी ही हम गाथा गाते हैं। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। ”
जब इसका अंग्रेजी अनुवाद जॉर्ज पंचम ने सुना तो वह काफी प्रभावित हुआ और टैगोर की तारीफ की। रविन्द्र नाथ टैगोर किंग से मिलने इंग्लैंड भी गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष था। टैगोर के भाई और बहनोई ने नोबेल प्राइज के लिए किंग के पास सिफारिश लगवायी और रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार मिलना पक्का हो गया। लेकिन रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया क्योंकि वे जानते थे कि यदि जनगनमन के लिए नोबेल मिला तो उनकी बड़ी फजीहत होगी। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जॉर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया। हालांकि बाद में टैगोर का अंग्रेजों से मोहभंग भी हुआ और उनके लिखे कुछ पत्रों से भी पता चलता है कि जन गण मन लिखने का उन्हें पश्चाताप था और वे नहीं चाहते थे कि इस गीत को ज्यादा प्रचारित किया जाए। लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस के एक बड़े तबके के विरोध के बावजूद जनगनमन को राष्ट्रगान घोषित कर दिया गया जबकि अधिकतर लोगों की पसंद वंदेमातरम ही थी। आज भी अपनी गुलामी के सबसे बड़े दस्तावेज को हम झूमझूम कर गा रहे हैं लेकिन वंदेमातरम से परहेज करते हैं क्योंकि इससे अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत होती हैं।

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