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चंपारण से खेड़ा तक – प्रियप्रकाश

चंपारण से खेड़ा तक
चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर गांधी को अपना बताकर और गांधी जी के पदचिन्हों पर चलने की बात कहने की कहीं दोनों सरकार के बीच होड़ तो नहीं ? या फिर गांधी जी के बताए रास्ते ही आज की बदली परिस्थिति में एकमात्र विकल्प है और इन दोनों नेताओं ने उस बारीकी को पकड़ा भर है जो गांधी जी ने कहा और किया था ।

-प्रियप्रकाश

यह एक संयोग ही है की सौ साल पहले जिस चंपारण सत्याग्रह की शुरूआत बिहार से हुई और उसका अगला पड़ाव गुजरात का खेड़ा बना आज उन्हीं दोनों राज्यों के दो बड़े नेता देश की राजनीति की दो धुरी बने हुए हैं । चंपारण के बाद 1918 में अहमदाबाद मिल के मजदूरों की समस्या और खेड़ा के किसानों के आंदोलन के लिए गांधी जी का योगदान भूला नहीं जा सकता है । यह बहुंत लंबी,मुश्किल और अहिंसक प्रक्रिया थी जिसने देश को आजाद कराने में अहम भूमिका निभाई । आज गांधी भारतीय अस्मिता के प्रतीक हैं और उनके पदचिन्हों पर चलने का दावा हर सरकारें करती है । यही कारण है की चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष में देश में कई कार्यक्रम हो रहे हैं। गुजरात गांधी की जन्मभूमि है तो चंपारण ही वो जगह है जहां आने के बाद गांधी जी महात्मा कहलाए ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात के ही हैं दूसरी तरफ नीतीश कुमार उसी राज्य के मुखिया है जो चंपारण सत्याग्रह की भूमि के नाम से जाना जाता है। दोनों अपनी तरफ से शताब्दी समारोह मनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं । बिहार सरकार पूरे एक साल तक कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है दूसरी तरफ केन्द्र सरकार भी चंपारण सत्याग्रह से जुड़ी जानकारियां प्रदर्शित कर रही है । देश के विभिन्न हिस्सों में स्वच्छता कार्यक्रम चलाने के साथ साथ खुले में शौच को समाप्त करने के लिए कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जा रहा है। वित्त मंत्री ने अपने बजटीय भाषण में चंपारण सत्याग्रह और साबरमती आश्रम की स्थापना के लिए वित्तीय मदद की घोषणा की थी । इसके मायने क्या हैं ? चंपारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष पर गांधी को अपना बताकर और गांधी जी के पदचिन्हों पर चलने की बात कहने की कहीं दोनों सरकार के बीच होड़ तो नहीं ? या फिर गांधी जी के बताए रास्ते ही आज की बदली परिस्थिति में एकमात्र विकल्प है और इन दोनों नेताओं ने उस बारीकी को पकड़ा भर है जो गांधी जी ने कहा और किया था । हम उसका आकलन करेंगे लेकिन पहले इन दोनों नेताओं की राजनीति के तौर-तरीकों को देख लीजिए जो कहीं न कहीं गांधी के विचारों पर चलने की ही कोशिश है ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच राजनैतिक तौर पर भिन्नता रही हो लेकिन वर्तमान राजनीतिक दौर में यही दोनों नेता हैं जिन्होंने लीक से हटकर गवर्नेंस को नई दिशा दी है। एक समय दोनों एक दूसरे के कट्टर विरोधी थे। एक मंच या समारोह में दोनों की मौजूदगी मीडिया में सुर्खियां बन जाया करती थी । दोनों के बॉडी लैंग्वेंज को लेकर खूब चर्चा होती थी । मौका मिलते ही ये दोनों नेता भी एक दूसरे पर जुबानी जंग से पीछे नहीं हटते थे, लेकिन राजनीति का तकाजा है कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं होता । विकास पुरूष का तमगा लिए दोनों नेताओं को यह एहसास हो गया की ज्यादा दिनों तक सिर्फ विरोध के लिए विरोध की राजनीति नहीं हो सकती ।

नोटबंदी का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुले दिल से स्वागत किया तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शराबबंदी को लेकर नीतीश कुमार की खुलकर तारीफ की । दोनों की छवि साफ है,आज तक किसी भी विवाद में नाम नहीं आया । प्रधानमंत्री कई साल तक गुजरात की मुख्यमंत्री रहकर दिल्ली पहुंचे हैं तो नीतीश कुमार केन्द्र में मंत्री रह चुके हैं और लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं । दोनों का लंबा राजनीतिक कैरियर रहा लेकिन घोटाले या भ्रष्टाचार के एक भी आरोप नहीं लगे । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता मिशन और सांसदों के एक गांव गोद लेने की योजना के सहारे अपनी एक अलग छवि बनाई है वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहले शराबबंदी और अब बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसे समाजिक मुद्दों को उठा रहे हैं वो आम राजनीति या गवर्नेंस से उन्हें अलग खड़ा करता है । ध्यान दें तो गांधी जी के भी यही विचार थे । समाज की कुरीतियों के खिलाफ गांधी जी अंत तक लड़ते रहे । बापू समाज में छूआछूत और नशे के सख्त खिलाफ थे । गांधी का एकमात्र सपना स्वच्छता और सुंदर गांव का था । प्रधानमंत्री का स्वच्छता मिशन कार्यक्रम और नीतीश कुमार शराबबंदी कार्यक्रम कहीं ना कही गांधी जी के विचारों को ही परिलक्षित करता है ।

बात इतनी भर नहीं है । क्या सचमूच ऐसे कार्यक्रम को लागू कर लेने भर से नए भारत की नींव रखी जा सकती है ? चंपारण सत्याग्रह उस समय अंग्रेजों द्वारा जबरन नील की खेती के विरोध में था तो गुजरात का खेड़ा जिले में किसानों का आंदोलन अंग्रेज सरकार की कर वसूली के विरूद्ध एक सत्याग्रह था, जिसका नतीजा यह हुआ की तत्कालीन सरकार को अपनी भूल का एहसास हुआ और सरकार ने बिना कोई सार्वजनिक घोषणा के गरीब किसानों से लगान की वसूली बंद कर दी । यही दोनों आंदोलन था जिसके फलस्वरूप दुनिया ने पहली बार सत्याग्रह को जाना । लेकिन किसान आज कहां खड़ा है ? किसानों को लेकर आज कोई चर्चा नहीं हो रही । जिस चंपारण सत्याग्रह की नींव ही किसानों की समस्या से पड़ी आज शताब्दी सारोह में वो मुद्दा ही गौण है । न तो केन्द्र सरकार के कार्यक्रम में और न ही राज्य सरकार के कार्यक्रम में । किसानों की चर्चा आज सिर्फ खुदकुशी के रूप में होती है । ज्यादा हो-हल्ला मचने पर सब्सिडी की मांग उठती है फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाता है । देश के किसान सौ साल पहले भी परेशान थे और आज भी वो परेशान हैं । आर्थिक विषमताएं,समाजिक कुरीतियां और धार्मिक-जातिगत तनाव आज भी देश की कमजोरी बने हुए हैं । सत्य,अहिंसा और प्रेम के जो मंत्र गांधी जी ने दिए आज अपने ही देश के अंदर अव्यवहारिक साबित किए जा रहे हैं । गांधी जी के नेतृत्व में देश के पहले सत्याग्रह की सौवीं वर्षगांठ पर उचित यही होगा की उनके बताए मार्गों की प्रासंगिकता को गहराई से समझें और अपनाने की कोशिश करें । चंपारण सत्याग्रह के समारोह के बहाने ही सही भारी बहुमत से जीते ये दोनों नेता यह कर सकते हैं । ‘महात्मा’ को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

लेखक सहारा टीवी में वरिष्ठ पत्रकार हैं

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