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घटेंगी जीएसटी दरें: जेटली

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जीएसटी दरें घटाने का संकेत दिया है। यह लागू हुए अभी दो-तीन माह ही हुए हैं, लेकिन इसमें सुधार की गुंजाइश दिखती है। “रेवेन्यू न्यूट्रल” होने की स्थिति में दरें घटाई जा सकती हैं। वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि जो लोग देश के विकास की मांग करते हैं, मौका आने पर उन्हें उसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी। विकास के लिए पैसों की जरूरत होती है, हालांकि इसे ईमानदारी से खर्च किया जाना चाहिए।

नेशनल एकेडमी ऑफ कस्टम्स, एक्साइज, इनडायरेक्ट टैक्सेस एंड नार्कोटिक्स (नैसिन) के स्थापना दिवस के मौके पर जेटली ने ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि जहां तक छोटे करदाताओं का सवाल है, उन्हें इसकी कागजी खानापूर्ति के बोझ से मुक्त करने की जरूरत है। वहीं “रेवेन्यू-न्यूट्रल” (करदाता बढ़ें और कर से आय न घटे) जैसी स्थिति बनने पर जीएसटी दरों में भी कमी हो सकती है।

वर्तमान में जीएसटी की चार प्रभावी दरें-5, 12, 18 व 28 फीसदी हैं। चुनिंदा वस्तुओं पर कर के अलावा जीएसटी मुआवजा उपकर भी लगाया गया है। विकसित राष्ट्र के लिए राजस्व बढ़ना जरूरीजेटली ने कहा कि राजस्व सरकार की जीवन रेखा होती है। इसके माध्यम से ही देश को विकासशील से विकसित राष्ट्र में तब्दील किया जा सकता है। अब लोग टैक्स देने के लिए आगे आ रहे हैं। इसी कारण करों को एक कर दिया गया है।

एक बार बदलाव स्थापित हो जाएंगे, फिर हमारे पास सुधार के लिए जगह होगी। लोगों को टैक्स के दायरे में लाने के लिए टैक्स डिपार्टमेंट के अधिकारियों को काम करना चाहिए। लेकिन, उन लोगों पर गैर जरूरी दबाव नहीं डाला जाना चाहिए, जो इस दायरे में नहीं आते।

बढ़ रही अप्रत्यक्ष कर से कमाई

वित्त मंत्री ने कहा कि “भारत में अप्रत्यक्ष कर से सरकारी की कमाई बढ़ रही है। अर्थव्यवस्था भी विकास कर रही है। प्रत्यक्ष कर प्रभावशाली वर्ग की ओर से दिया जाता है, जबकि अप्रत्यक्ष कर का बोझ सभी पर पड़ता है। इसीलिए हमने वित्तीय नीतियों में जरूरी चीजों पर सबसे कम टैक्स लगाने का फैसला किया है।

नौकरियां नहीं बढ़ने से आय असमानता बढ़ेगी

उधर, मुंबई की एक ब्रोकरेज फर्म एंबिट कैपिटल का दावा है कि सरकार नौकरियां पैदा करने में अक्षम होने से देश में आय की असमानता और बढ़ने का अंदेशा है। फर्म ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बेरोजगारी के हालात पिछले कुछ सालों में बढ़े हैं और आय की असमानता से सामाजिक तनाव की जोखिम बढ़ गई है।

फ्रांस के एक अर्थशास्त्री के नवीनतम निष्कर्ष के आधार पर कहा गया है कि 1980 के दशक से यह असमानता निरंतर बढ़ रही है। देश की 50 फीसदी आबादी का राष्ट्रीय आय में मात्र 11 फीसदी हिस्सा है, जबकि शीर्ष 10 फीसदी आबादी के पास 29 फीसदी हिस्सा है।

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