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DHADAK REVIEW:धड़क में ऐसा एक भी प्रसंग नहीं आता जहाँ इश्क़ रूह से गुज़रता नज़र आये

कमलेश के.मिश्र

 

सब “सैराट” के नाम पर हुआ है तो बात “सैराट” से ही शुरू होगी.


“सैराट” का वह आख़िरी सीन और उसका आख़िरी शॉट। डिटेल छोड़ देते हैं, आपको फ़िल्म देखनी चाहिए। फ़िल्म का वह आख़िरी शॉट सिनेमाई क्राफ़्ट को जो ऊँचाई देता है वह हिंदी फ़िल्मों में अब विरले ही दिखता है। और इसकी वजह भी है। अब ज़्यादातर हिंदी फ़िल्में एक “प्रोजेक्ट” की तरह पूरी कर लीं जाती हैं। गुरुदत्त और राज कपूर जैसे सिनेमा साधकों का ज़माना तो रहा नहीं. ख़ैर, तो सैराट का वह क्लोज़िंग शॉट दिल में शूल की तरह उतरता है और आप निशब्द, स्तब्ध, अवाक् अपनी कुर्सी पर जमे रह जाते हैं. आपका ख़ुद से चल रहा सम्वाद भी थम जाता है। कुछ मिनटों बाद आपको अहसास होता है कि फ़िल्म ख़त्म हो गई है।

जब मैंने मुंबई में सैराट देखी थी, उस वक़्त थीयटर से बाहर निकलते वक़्त जो ख़ामोशी थी वह आम तौर पर नहीं दिखती. और यही बात सैराट को पूरे हिंदुस्तान को चर्चित कर गई. सैराट की कहानी सिनेमा में पहले भी कई बार कही गई है, फिर भी वह इस क़दर लोकप्रिय हुई तो उसकी वजह थी, उसका “देसीपना”, उसके कथानक का स्वतंत्र प्रवाह। और फिर ऊपर से उसकी कास्टिंग। मानो दो प्रेमी अपनी रौ में बहे जा रहे हों और कैमरा चुपके से सब कुछ क़ैद कर रहा हो और जो हुआ, जो घटा सब जस का तस रख दिया हो थीयटर में।
अब आते है उसकी रीमेक पर. धड़क सैराट का राजस्थानी रीमेक है, जिसमें बीच बीच में हिंदी की लाइनें बोली जा रहीं हैं, इसलिए उसे हिंदी रीमेक ही कहा जा रहा है. हिंदी का बाज़ार बड़ा है, विस्तार है इसलिए हिंदी कहना ज़रूरी है. राजस्थानी रीमेक कह देते तो बाज़ार छोटा हो जाता और क्या पता कोई ठेठ राजस्थानी अड़ जाता, “ये कैसी राजस्थानी है भाई!!” जैसे कुछ लोगों को लगता है कि किसी भी शब्द में “वा” जोड़ देने से भोजपुरी बन जाती है वैसे ही धड़क वालों को लगा कि शब्दों में “ओ” जोड़ते रहो, हो गई राजस्थानी.

अब आते हैं धड़क की कहानी और किरदार पर। दूसरों की क्या दो प्रेमियों की ही बात कर लेते हैं. प्रेम कहानी है, तो ज़रा प्रेम को पनपने की ज़मीन देते, उसे सूखने, सींचने फिर खिलने के वाजिब अवसर देते तो कुछ बात जमती. कहानी में मिलने मिलाने के ढेरों संयोग जुटाए गए हैं और वह साफ़ झलक रहे हैं.

सैराट में लड़की गाँव की है, बावड़ी में नहाती है तो क्या शेर-ए उदयपुर की बेटी भी आज की तारीख़ में बावड़ी में ही नहाएगी?! फ़िल्म है तो नहा लेने दो. सैराट का एक दृश्य है जिसमें नायक नायिका की सैंडील पर फूल चढ़ाता है. सच में तब लगता है, इश्क़ इबादत हो गया। धड़क में ऐसा एक भी प्रसंग नहीं आता जहाँ इश्क़ रूह से गुज़रता नज़र आया हो। भागना -भगाना तो ख़ैर ठीक है। उसके बाद की मुश्किलें और उसमें प्रेम का और विस्तारित हो जाना छूट ही गया है।

ईशान ऐक्टर अच्छे हैं, और इसमें भी ठीक हैं, आगे भी अच्छा ही करेंगे। जाह्नवी ने कोशिश अच्छी की है, फिर भी स्टारपुत्री न होतीं तो ऐसे रोल पाने के लिए ऑडिशन के न जाने कितने दौर से गुज़रना पड़ता। पर यह लड़की इंडस्ट्री
में जम जाएगी।

फ़िल्म का संगीत उन्हीं अजय-अतुल का है जिन्होंने मूल मराठी फ़िल्म सैराट में संगीत दिया है, फिर भी कोई गीत ऐसा नहीं बन पाया जो कलेजे को जा लगे. उदयपुर और कोलकाता दोनों सुंदर शहर हैं, इस फ़िल्म के ज़रिए भी आप देख सकते हैं.
हाई-प्रोफ़ाइल फ़िल्म है, जो मूल फ़िल्म नहीं देखें हैं उन्हें बोर नहीं करेगी, बिज़नेस तो ठीक होगी ही. फ़िल्म के आख़िरी सीन और शॉट को भी सैराट की तरह हैरानीपूर्ण बनाने की कोशिश की गई है, पर जो भी हो-
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल 
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

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