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देवबंद को देववृंद करने से क्या होगा? रवि पाराशर

रवि पाराशर
हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद सहारनपुर ज़िले के देवबंद क़स्बे का नाम ‘देववृंद’ करने के समर्थन में आवाज़ उठी। एक और मांग चर्चा में है कि मुंबई में ढाई एकड़ में बने 2603 करोड़ रुपए की क़ीमत वाले जिन्ना हाउस को ढहाकर वहां सांस्कृतिक केंद्र बनाया जाए। नाम बदलने की मांगें वक़्त-वक़्त पर उठती रहती हैं और कभी-कभी इन पर अमल भी होता है। जैसे दिल्ली की एक सड़क- ‘औरंगज़ेब रोड’ का नाम बदल कर ‘एपीजे अब्दुल कलाम रोड, ‘डलहौज़ी रोड’ का नाम बदलकर ‘दारा शिकोह रोड’ किया गया और हरियाणा के ‘गुड़गांव’ का नाम बदलकर ‘गुरुग्राम’ कर दिया गया।

सवाल यह है कि नाम बदले क्यों जाने चाहिए? इससे किसी भारतीय नागरिक की अस्मिता पर क्या फ़र्क़ पड़ता है? यह कहना सही होगा कि जो नाम या प्रतीक गुलामी की याद दिलाता हो, उसे बदला जाना चाहिए। लेकिन शहरों, गांवों वगैरह के जो नाम पहले संस्कृत या कठिन हिंदी में थे, अगर वे बोलचाल की देशज परंपरा में थोड़े-बहुत घिस गए हैं, तो क्या उनका शुद्धिकरण भी होना चाहिए? जो लोग इसके पक्षधर हैं, तो वे फिर ऐसे सभी नामों को बदले जाने के पक्ष में भी हैं क्या? संस्कृत भाषा वर्ग विशेष में प्रचलित रही। वजहें जो भी रही हों, लेकिन संस्कृत लोकभाषा नहीं बनी। संस्कृत में लिखी गई वाल्मीकि की रामायण की बजाए तुलसी दास की रामचरित मानस लोकप्रिय हुई। ऐसे में जो नाम संस्कृत भाषा के प्रभाव में रखे गए, कालांतर में उनके कोने बोलचाल की भाषा में घिसते रहे। कुछ द्रविड़ भाषाओं को छोड़कर उच्चारण की भौगोलिक मजबूरी इसकी वजह रही होगी। लेकिन हक़ीक़त यही है कि शब्दों के कोने घिस कर उनके उच्चारण भले बदल गए हों, अर्थ नहीं बदले। तो इसमें किसी को क्या परेशानी है? हर भाषा के बहुत से शब्द रूढ़ होते रहते हैं।

हालांकि भाषाओं के विकास क्रम में बहुत से अर्थ भी रूढ़ होकर व्यापक संज्ञा बनते रहते हैं। सब्ज़ी’ शब्द को ही लें। यह उर्दू के शब्द ‘सब्ज़’ से बना है। ‘सब्ज़’ का मलतब है हरे रंग का। यानी शाकाहारी भोजन में हरे पत्तों वाली तरकारी को ‘सब्ज़ी’ कहा गया। लेकिन आजकल इसका अर्थ घिस गया है। अब हर तरह की तरकारी के लिए ‘सब्ज़ी’ शब्द का ही प्रयोग होता है। आलू की भी सब्ज़ी बनती है, गाजर की भी सब्ज़ी बनती है। यानी तरकारी किसी भी रंग की हो, पकने के पहले या बाद में सब्ज़ी ही होती है। इसी तरह ‘प्रहरी’ और ‘कुशल’ सब्दों को देखें। ‘प्रहरी’ पदनाम था। उसका काम बड़े घंटे पर प्रहार कर संदेश पहुंचाना था। ये घंटे निश्चित दूरी तक निश्चित आवृत्ति में लगे होते थे। आज की अभिव्यक्ति में हम इन्हें सुरक्षा चौकियां कह सकते हैं। उस वक्त आकस्मिक संचार के लिए ध्वनि और रंगों का इस्तेमाल होता था। लेकिन आज ’प्रहरी’ शब्द पहरेदार या चौकीदार के रूप में रूढ़ हो गया है। ’कुशल’ शब्द भी कार्यपालन से उपजी संज्ञाओं में से एक है।

आश्रमों में पढ़ाई के लिए जाने वाले बच्चों में से किसी एक को ’कुशल’ की संज्ञा दी जाती थी। उसका काम था यज्ञ के लिए कुश घास लाना। कुश घास कंटीली होती है, इसलिए किसी तेज़-तर्रार बच्चे को यह ज़िम्मेदारी दी जाती थी, ताकि वो हाथ घायल न कर ले। लेकिन अब किसी भी काम में निपुण किसी भी शख्स को ’कुशल’ कहा जाता है। कुशल-क्षेम पूछी जाती है। कुशलता की कामना की जाती है। ऐसे शब्दों की संख्या किसी भी भाषा में लाखों में होगी, तो क्या अब उन्हें फिर से शुद्ध रूप में ही इस्तेमाल करने की वक़ालत की जा सकती है?

आज के दौर के मीडिया ने भी बहुत से शब्दों के माइने बदले हैं। बहुत इस्तेमाल होने वाला एक शब्द है ’आरोपी’। मीडिया में ’आरोपी’ वह है, जिस पर कोई आरोप लगा हो। लेकिन यह सही नहीं है। जिस पर आरोप हो, उसे ’आरोपित’ कहा जाना चाहिए। ’आरोपी’ तो वह होगा, जो आरोप लगा रहा हो। अंग्रेज़ी के ‘साइंटिस्ट’ शब्द का अर्थ अगर हम ‘वैज्ञानिक’ बताएंगे, तो फिर ’साइंटिफ़िक’ शब्द का अर्थ क्या होगा? असल में हम जिसे ’वैज्ञानिक’ कहते हैं, उसे ’विज्ञानी’ कहना चाहिए। ’ख़ुलासा’ और ‘ख़िलाफ़त’ जैसे ऐसे लाखों शब्द मिल जाएंगे, जो सही अर्थों में इस्तेमाल नहीं हो रहे। कुछ का इस्तेमाल तो बिल्कुल विरोधाभासी अर्थों में हो रहा है। ज़रूरत ऐसे शब्दों के शुद्धिकरण की है, न कि अर्थ नहीं बदलने वाले घिस चुके शब्दों की।

अंग्रेज़ों ने उच्चारण की सहूलियत के लिए हमारी ’गंगा जी’ को ’गेंजिज़’ कर दिया। अगर शुद्धिकरण अभियान चलाना है, तो ’गेंजिज़’ शब्द को ‘गंगा जी’ में तब्दील करने के लिए चलाया जाए। हालांकि ये कमज़ोर तर्क है। गेंजिज़ फ़ोनेटिक उच्चारण का मामला है। इस पर किसी का बस नहीं। हमने उनके लैंटर्न का लालटेन कर दिया। फिर भी स्पेलिंग बदलने के लिए आवाज़ उठाई जा सकती है। अन्यथा तो इस तरह की मांगें या कोशिशें समाज में विघटन की लकीरें ही खींचती हैं। इन निरर्थक प्रयासों से समाज का कुछ भी भला नहीं हो सकता। ज़िलों, क़स्बों या गांवों के नाम बदले जाने से उल्टे लाखों रुपए के राजस्व का नुकसान होता है। ये बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को अखिलेश यादव की तस्वीर वाले करोड़ों राशन कार्ड रद्द करने पड़े। अब नए कार्डों पर जनता के ही करोड़ों रुपए फिर बर्बाद होंगे।

आज़ादी के बाद जगह-जगह लगी विक्टोरिया की प्रतिमाएं और दासता के दूसरे प्रतीकों को हटाया जाना सही था। बहुत से लोग अब कहने लगे हैं कि मुग़ल शासनकाल के भी सभी प्रतीकों को हटा दिया जाए। ऐसा करना भी सही नहीं होगा। इस तरह की कोई भी मांग भारत जैसे बहुलतावादी देश में पॉपुलर नहीं हो सकती। क्या हम लालकिले, ताजमहल, कुतुब मीनार वगैरह को तोड़ सकते हैं? मुट्ठी भर सियासी लोगों की ऐसी मांगों का कोई जनाधार नहीं होता। अंग्रेज़ शासन कर यहां बसे नहीं, मुग़ल शासन कर यहीं बस गए और बहुत से हिंदू धर्म परिवर्तन कर, ज़बरन ही सही, मुस्लिम हो गए। उनकी जड़ें तो भारत में ही थीं। जिन आक्रांताओं ने कालांतर में भारत या भारतीयता को आत्मसात किया, उनसे हिंदुओं की चिर सामाजिक दुश्मनी हो ही नहीं सकती।

हां, उन विदेशी आक्रांताओं के स्मृति चिह्नों को ज़रूर ख़त्म किया जाना चाहिए, जो भारतीय अस्मिता के इतिहास में खलनायकों की तरह दर्ज हैं, जिन्होंने यहां के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया। अगर करना ही है, तो विदेशियों के अलावा उन खलनायकों के स्मृति चिह्नों को भी नष्ट करने की ज़रूरत है, जो हिंदू समाज से ही थे, लेकिन जिन्होंने अपने फ़ायदों के लिए रजवाड़ों या अंग्रेज़ों की गुलामी के दौरान भारतीयता को नुकसान पहुंचाने का काम किया। अगर कुछ करना है, तो भारत को कॉमनवेल्थ संगठन से निकलना चाहिए। हमें आज़ाद हुए 70 साल हो चुके हैं। इस संगठन की मुखिया आज भी ब्रिटेन की महारानी हैं। यह उन देशों का संगठन है, जिन पर अंग्रेज़ों ने शासन किया था। कम से कम इस पर बहस तो शुरू हो। देवबंद अगर ‘देववृंद’ नहीं होगा, तो कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। भारत अगर कॉमनवेल्थ से बाहर निकलेगा या उसका नेतृत्व करेगा, तब ज़रूर देश का गौरव बढ़ेगा। योग को ‘योगा’, अशोक को ‘अशोका’ और बुद्ध को ‘बुद्धा’ से बचाइए श्रीमान! ‘बंद’ और ‘वृंद’ के चक्कर में मत पड़िए!

रवि पाराशर
341, सेक्टर 4-सी, वार्तालोक अपार्टमेंट,
वसुंधरा, ग़ाज़ियाबाद- 201012

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