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दिल्ली दंगे- प्रयोग का एक वर्ष, अतुल गंगवार

अतुल गंगवार

आज 23 फरवरी है। इसी दिन पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद इलाके ने तथाकथित गंगा-जमुनी तहजीब के चिथड़े उड़ते देखे थे। बरसों से लगे भाई चारे के नकाब के पीछे छिपे दरिंदों को बेनकाब होते देखा था। ये दंगे हुए अवश्य 23 फरवरी को थे लेकिन इनकी भूमिका शाहीन बाग के धरने में ही बन रही थी। देश एक ऐसे आंदोलन को होते देख रहा था जिसका कोई सर पैर नहीं था। ऊपरी तौर पर ये आंदोलन CAA-NRC के खिलाफ था लेकिन अंदर ही अंदर कुछ ऐसा पक रहा था जो ये बता रहा था कि मामला सिर्फ ये नहीं है जो दिखाई दे रहा है। इस आंदोलन के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में दिल्ली नोएडा की एक प्रमुख सड़क को बंद कर दिया गया था। जमा भीड़ को ये बताया गया था कि CAA-NRC के लागू होने के बाद देश में रह रहे मुसलमानों को यहां से निकाल दिया जाएगा। कागज दिखाने के नाम पर मुसलमानों को परेशान किया जाएगा। उनकी नागरिकता चली जायेगी।

देश के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं तमाम बड़े नेताओं के संसद में, संसद के बाहर लगातार ये कहने के बावजूद कि ये कानून नागरिकता लेने का नहीं, नागरिकता देने का कानून है संपूर्ण विपक्ष केन्द्र सरकार को संकट में डालने का काम कर रहे थे। जिस तरह के नारे इस आंदोलन में लग रहे थे उससे ये स्पष्ट हो गया था कि CAA-NRC का विरोध देश को अस्थिर करने के लिए किया जा रहा है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था,”सीलमपुर हो, जामिया हो या फिर शाहीन बाग, बीते कुछ दिनों से CAA को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं, क्या ये प्रदर्शन सिर्फ एक संयोग है, जी नहीं ये संयोग नहीं ये एक प्रयोग है। इसके पीछे राजनीति का एक ऐसा डिजाइन है जो राष्ट्र के सौहार्द्र को खंडित करने का इरादा रखता है”।

शाहीन बाग के इस प्रयोग को विस्तार देने के लिए जब जाफराबाद मैट्रो स्टेशन के नीचे सड़क रोकी गई और भाजपा नेता कपिल मिश्रा के दिल्ली पुलिस को ये चेतावनी देने के बाद कि अगर दिन में ये सड़क खाली नहीं कराई गई तो वह स्वयं इसे खाली करायेंगे। वहां बैठे लोगों ने तीन दिन इंतज़ार करना भी ज़रूरी नहीं समझा और उसी दिन रात से पूर्वी दिल्ली के इस इलाके के लोगों ने तबाही का, आतंक का जो मंजर देखा उसने तमाम भाई-चारे, पड़ोसी, दोस्ती-यारी के पीछे छुपे दरिंदों को बाहर निकाल दिया। देश ने दिल्ली की सड़कों पर हिंसा का जो तांडव देखा उसने 1947 के भारत विभाजन के घावों को हरा कर दिया। कोई भी सभ्य समाज शायद इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता जो इन दंगों के दौरान हुआ। दिल्ली में शासन कर रही आम आदमी पार्टी की सरकार के नेताओं ने खुलकर इन दंगों में हिंदुओं के खिलाफ माहौल बनाया और ऐसे साधन मुसलमान दंगाईयों के मुहैया कराये जिससे उन्हें हिंदू का संहार करने में आसानी हो। उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा चाहे कॉस्टेबल रतन लाल हो, आई बी का अधिकारी अंकित, या फिर खुलेआम पुलिस पर पिस्टल तानता शाहरुख हो। उन्होंने किसी को नहीं छोड़ा हर खास और आम उनके आतंक का निशाना बना। क्रिया की प्रतिक्रिया में जब पिटाई हुई तो इनके आकाओं ने विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर दिया और देश विदेश में ये नेरेटिव सेट करने का प्रयास किया गया कि भारत में हिंदुवादी सरकार के आने के बाद से अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है। इस विषय पर प्रख्यात निर्देशक कमलेश मिश्रा की दिल्ली दंगों की सच्चाई को सामने रखती फिल्म Delhi Riots: A Tale Of Burn & Blame, VOOT पर आज से प्रदर्शित हो रही है।

ये मामला चल ही रहा था कि हाथरस में एक लड़की के बलात्कार और हत्या को भी अगड़े पिछड़े के रंग में रंगने का प्रयास करके समाज में असंतोष फैलाने का काम किया गया।

इसके बाद बंगलोर में कॉंग्रेस के नेता की कथित धार्मिक टिप्पणी से नाराज होकर शांति प्रिय समुदाय के लोगों ने अपना असली रंग दिखाये और दंगों की आग में शहर को जलाने का प्रयास किया। यहां पर भी एक बात साथ साथ हो रही थी। शांति प्रिय समुदाय के लोग एक तरफ आग लगा रहे थे वहीं दूसरी ओर मंदिर को बचाते हुए फोटो भी खिचवा रहे थे। मंदिर को बचाने की तस्वीरों को दिखा कर उनका हिमायती वर्ग उन्हें शांति दूत बताकर कॉंग्रेसी नेता के घर पर और इलाके में हुए दंगे पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहा था।

आज ठीक एक बरस के बाद इस प्रयोग पर चर्चा करना इसलिए भी आवश्यक है कि अभी ये प्रयोग रुका नहीं है। हां इस बार भी हर बार की तरह प्रयोगशाला बदल गई है। लेकिन उद्देश्य वही है किसी भी तरह देश को संकट में डाला जाये। मोदी का विरोध करते करते आज भी ये देश का विरोध बन जाता है। मसला कोई भी हो लेकिन जिस तरह से हमारे देश के अंदरूनी मामलों में खुल कर विदेशी मदद या हस्तक्षेप बढ़ रहा है उससे ये स्पष्ट है कि किसी भी समस्या का विरोध उसके समाधान के लिए नहीं उस समस्या को स्थायी बनाने के लिए किया जा रहा है। इस बार इस प्रयोगशाला का नाम है केन्द्र सरकार द्वारा किसानों के हालात को सुधारने के लिए लाए गए कृषि सुधार कानूनों का विरोध।

समस्या नई है। समाधान का तरीका वही पुराना। इस बार सड़क पर किसान हैं। उनके साथ एक बार फिर वही लोग हैं जो शाहीन बाग में दिखाई दिए थे। यही ज़ाफराबाद में भी थे। हाथरस में भी थे। यही बैंगलोर में भी थे। कोरोना काल में कभी मजदूरों को भड़काकर सड़क पर लाने वाले और फिर सरकार को कोसने में भी दिखाई दिए थे। वही लोग आज किसान बनकर दिल्ली की सीमाओं पर कब्जा करके बैठे हैं। संसद में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन लोगों के इस वर्ग को आंदोलनजीवी का नाम दिया है।

कहने को ये किसानों का आंदोलन है, सरकार के काले कानूनों के विरोध में हैं। पर इस पांच सितारा आंदोलन को चलाने के लिए पैसा विदेश से आ रहा है। खलिस्तान के पोस्टर, बैनर भी दिखाए दे रहें है। 26 जनवरी को देश की राजधानी दिल्ली में हिंसा को फैलाने का प्रयास, लालकिले पर झंडा फहराने का प्रयास भी करते ये तथाकथित किसान दिखाई दिए। इस हंगामे में हर संभव प्रयास किया गया कि किसी तरह से सामने से भी थोड़ा विरोध दिखाया जाए तो इस को हिंसा में बदला जाए। पहली बार हमने देखा कि दिल्ली पुलिस के जवानों ने अपनी जान खतरे में डाल दी लेकिन क्रिया की कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सोचिए 300 से अधिक पुलिस के जवान घायल हुए, अगर पुलिस जवाबी कार्यवाही करती तो दिल्ली की सड़कों पर क्या नजारा दिखाई देता। देश की क्या छवि विश्व में बनाई जाती।

सरकार निरंतर पूछ रही है इन कानूनों में क्या बुरा है, क्या गलत है, आइये, बैठिये बात कीजिए। सरकार सुधार करेगी लेकिन किसान नेता एक ही जिद पर अड़े हैं इन्हें वापिस करो। सरकार जैसे CAA के समय में कह रही थी कि ये कानून नागरिकता लेने वाला नहीं देने वाला है। वही अभी भी कह रही है कि कृषि कानून पुरानी व्यवस्था को खत्म नहीं कर रहें बल्कि किसानों को एक नया विकल्प दे रही है। आप दोनों में से किसी भी व्यवस्था का उपयोग करके अपनी आय बढ़ा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के सामने नहीं जायेंगे। सरकार के इस आश्वासन पर भी कि ये कानून डेढ़ साल के लिए स्थगित किए जाते हैं, ये किसान नेता कुछ भी सकारात्मक दिशा में बढ़ने के लिए तैयार नहीं है क्योंकि अब ये स्पष्ट हो गया है ये आंदोलन किसानों का नहीं राजनैतिक है। आंदोलनजीवी नेताओं को किसानों की समस्या के समाधान में कोई रुचि हो तो वह सरकार की बात माने, समझें और किसानों को समझायें। वह तो बस एक ही काम कर रहें हैं किसी भी तरह से इस आंदोलन को भड़काए रखें। 26 जनवरी की पुनरावृति दोबारा हो। इसलिए कभी सड़कों पर, कभी रेल की पटरियों पर, कैसे भी सरकार को संकट में डालो। आम आदमी में असंतोष पैदा करों। उन्हें आपस में लड़ाने का काम करो। दिल्ली दंगों की तरह, किसान आंदोलन में भी हिंसा फैलाओ देश की छवि को अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बिगाड़ो।

तो ये प्रयोग जो दिल्ली दंगों में दिखाई दिया था अब भी चल रहा है। मंच बदल गया है। नीयत नहीं बदली है। इस बात की कोई संभावना भी नहीं दिख रही कि ये प्रयोग अभी थमने वाला है। हो सकता है इन दंगों की अगली बरसी तक किसान नाम की प्रयोगशाला बंद हो जाए, जैसे अभी CAA-NRC नाम की प्रयोगशाला बंद है। हो सकता है अगला नंबर मजदूरों का हो या फिर आपका। आखिर ये वह गिद्ध हैं जो विध्वंस में ही अपना भोजन ढूंड़ते हैं। देश का प्रधानमंत्री इन्हें आंदोलन जीवी यूं ही नहीं कहता।

 

 

 

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