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जानिए दिल्ली को किसने दिया इंद्रप्रस्थ नाम , ये कैसा बना महातीर्थ- सर्जना शर्मा

सर्जना शर्मा

भारत की राजधानी दिल्ली कई बार बसी कईं बार उजड़ी । दिल्ली में ऐसा कुछ विशेष तो है कि हर विदेशी आक्रमणकारी को दिल्ली का तख्तो ताज चाहिए । जिसके पास दिल्ली नहीं उसके पास कुछ नहीं । ये वही दिल्ली है जो कौरवों पांडवों का इंद्रप्रस्थ थी । और यदि हम द्वापर युग से और पीछे सतयुग की ओर जाएं तो पता चलता है कि दिल्ली तो एक बहुत बड़ा तीर्थ थी और खांडव वन के नाम ये क्षेत्र जाना जाता था । हो सकता है आपको विश्वास न आए, हो सकता है आपको लगे जो आज छल प्रंपच की नगरी कहलाती है वो तीर्थ कैसे हो सकती है । लेकिन आप विश्वास मानिए दिल्ली बहुत बड़ा तीर्थ थी । जिसमें सातों पवित्र नगरियां और अन्य बड़े तीर्थों का वास था । पद्मपुराण में इसकी महिमा का विस्तार से वर्णन है । मेरे दो मित्र NALIN CHAWHAN , , VIVEK SHUKLA दिल्ली पर रोचक लेख लिखते रहते हैं । उन्हीं की श्रृंखला में आज एक कड़ी मेरी भी — फेसबुक मित्रों के साथ ये अद्भुत जानकारी साझा करते हुए मुझे खुशी हो रही है– सर्जना शर्मा


पद्मपुराण के उत्तरखंड में इंद्रप्रस्थ तीर्थ का महत्व सौभरि ऋषि ने धर्मराज युधिष्ठर को बताया था । युधिष्ठर ने सौभरि मुनि से पूछा था– सूर्यपुत्री यमुना के तट पर ऐसा कौन सा तीर्थ है जो भगवान की जन्भूमि मथुरा से भी बड़ा है ? तब ऋषि ने उनको बताया कि एक बार महर्षि नारद और पर्वत मुनि आकाश मार्ग से जा रहे थे उनकी दृष्टि अति मनोहर खांडव वन पर पड़ी । इंद्रप्रस्थ नाम पड़ने से पहले इस क्षेत्र का नाम खांडव वन था । दोनों मुनि वन की सुंदरता और मनोहरता देख कर उतर गए और यमुना जी के तट पर बैठ कर प्रकृति का आनंद लेने लगे । और निर्मल यमुना नदी नें स्नान के लिए उतर गए ।तभी उशीनगर देश का राजा शिबि जगंल में शिकार खेलने आया । दोनों महान ऋषियों को देख कर वह यमुना के तट पर बैठ कर उनकी प्रतीक्षा करने लगा । जब वे दोनों स्नान करके निकले तो उसने उनकी चरण वंदना की । तीनों बैठ कर सत्संग कर रहे थे कि राजा की दृष्टि यमुना के तट पर बने सोने के हज़ारों स्तंभों वाले यज्ञ मंडपों पर गयी । उसने दोनों से पूछा ये किसने और क्यों बनवाएं ?
महर्षि नारद ने राजा को बताया कि — हिरण्यकश्यप ने जब देवताओं को हरा कर तीनों लोकों का राज प्राप्त कर लिया और उसने अपनी कठिन तपस्या से दुर्लभ वरदान भी पा लिए तो उसके घमंड और अत्याचार का अंत करने के लिए भगवान श्री विष्णु ने नृसिंह अवतार लिया और उसका वध करके स्वर्ग का राज पाठ फिर से राजा इंद्र को सौंप दिया । प्रसन्न राजा इंद्र देव गुरु बृहस्पति के पास गए और कहा मैं श्री हरि विष्णु का पूजन करना चाहता हूं उन्होनें मेरा राज पाठ मुझे लौटाया । कोई अति पवित्र स्थान और श्रेष्ठ ब्राह्मण बताइए । देवगुरू बृहस्पति ने कहा — “खांडव वन ( वर्तमान दिल्ली ) पवित्र और पुण्यदायी यमुना के तट पर बसा है तुम वहीं यज्ञों से केशव की आराधना करो “। इंद्र ने मुनि वशिष्ठ समेत सात मुनियों और कुछ ब्राह्णों के साथ खांडव वन में यज्ञ करना आरंभ कर दिया । इंद्र के यज्ञ से प्रसन्न हो कर ब्रह्मा विष्णु और महेश तीनों खांडव वन में पधारे । इंद्र ने उन्हें सोने के सिंहासनों पर बिठाया और विधि विधान से पूजन वंदन किया । इंद्र उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया और भगवान विष्णु की स्तुति करने लगा । इंद्र की भक्ति से प्रसन्न हुए श्री हरि विष्णु बोले — जिन मुनियों को तुमने यज्ञ के लिए बुलाया है ये बहुत ज्ञानी हैं और मेरी भक्ति को गौरव प्रदान करते हैं । जब जब वैदिक मार्ग नष्ट होता है उसे पुन: स्थापित करते हैं । तुम सौभाग्यशाली हो कि तुम्हारे गुरू बृहस्पति हैं । तुम जितने यज्ञ करो उसके साथ एक प्रस्थ ( एक सेर ) रत्नों का दान करो । फिर ये स्थान तुम्हारे नाम से इंद्रप्रस्थ कहलायेगा । और इस तरह श्री हरि विष्णु के वरदान से इंद्रप्रस्थ नाम पड़ा । इतना ही नहीं भगवान विष्णु ने आदि देव महादेव से कहा कि आप यहां काशी ,शिवकाशी की स्थापना कीजिए और पार्वती जी के साथ इस तीर्थ मे वास किजिए । देवगुरू बृहस्पति से कहा कि आप यहां निगमोद्धोधक तीर्थ की स्थापना किजिए । इस तीर्थ में स्नान करने से पूर्वजन्म की स्मृति और परमात्मा का ज्ञान प्राप्त होता है । विष्णु जी ने कहा — मैं यहां द्वारका , अयोध्या, बदरिकाश्रम की स्थापना करता हूं और सदा यहीं रहूंगा । हरिद्वार , पुष्कर , नैमिषारण्य के साथ साथ सरस्वस्ती नदी के तट पर जितने तीर्थ हैं उनकी भी स्थापना करता हूं । राजा इंद्र ने सोने के यज्ञ कुंड बनवा कर यज्ञ किए और ब्राहम्णों को रत्नों के प्रस्थ दान किए । तभी से ये स्थान इंद्रप्रस्थ तीर्थ बन गया । निगमोद्धधक तीर्थ और सप्त तीर्थ के बीच देवताओं ने इंद्रप्रस्थ क्षेत्र की स्थापना की । ये पूर्व से पश्चिम की ओर एक योजन चौड़ा और यमुना के दक्षिण तट पर चार योजन की लंबाई में फैला हुआ था । ऐसा प्रतीत होता है कि जहां आज निगम बोध घाट है वहीं निगमोद्धोधक तीर्थ की स्थापना देवगुरू बृहस्पति ने की थी ।
आदि काल में दिल्ली एक ऐसा महान तीर्थ थी जिसमें भारत के सभी तीर्थों का वास था । समय समय के साथ दिल्ली बदलती रही दिल्ली का राज बदलता रहा । बार बार बसने और उजड़ने का प्रक्रिया में दिल्ली का धार्मिक आध्यात्मिक महत्व कम होता चला गया और राजनैतिक महत्व बढ़ता गया । बाकी तीर्थ दिल्ली में कहा कहां रहे होंगें इसकी जानकारी हो सकता है किसी अन्य पुराण या धर्मग्रंथ में हो या । पद्मपुराण में तो दिल्ली की मथुरा धाम से भी ज्यादा महिमा बतायी गयी है ।

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