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देहदान-अंगदान समाज की ज़रूरत

देहदान-अंगदान समाज की एक बड़ी जरूरत

एक देह के दान से कई जिंदगियां रोशन हो सकती हैं। अगर एक व्यक्ति भी देहदान करने से प्रेरित होता है, तो दधीचि देह दान समित्ति उत्तर पूर्वी क्षेत्र का यह प्रयास सार्थक हो जाएगा इसी उदेश्य को मूल मन्त्र मान कर दधीचि देहदान समिति के तत्वावधान में गोविन्दम बैंकट हॉल दुर्गा पूरी चौक विहार में देहदानियों का उत्सव सम्पन्न हुआ। इसमें 16 देहदानियों के परिजनों को सम्मानित किया गया।एवम 7 दिन के नवजात शिशु का देहदान जैसे कठिन निर्णय लेने वाले दम्पति सूरज एवम आँचल को भी को भी सम्मानित किया इसके साथ ही इस अवसर पर 136 लोगों ने देहदान एवं अंगदान का संकल्प लिया। कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित ब्रह्मकुमारी उर्मिला दीदी, महामंडलेश्वर स्वामी अनुभूतानंद जी, डॉ वी पी गुप्ता और श्री आलोक कुमार (संघ सह प्रान्तचालक एवम् संस्थापक दधीचि देह दान समिति) द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। अपने संबोधन में श्री आलोक कुमार ने कहा कि आज भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि लोग बड़ी संख्या में देहदान और अंगदान के लिए आगे आएं, ताकि प्रतिवर्ष लाखों लोगों को जीवनदान मिल सके। उन्होंने कहा कि लोग अंगदान नहीं करते इसलिए ही अंगों का अवैध कारोबार होता है, यदि हम चाहते हैं कि यह कारोबार बंद हो तो हमें अंगदान और देहदान के लिए आगे आना होगा। अलोक कुमार ने कहा कि भारत ऋषि दधीचि जैसे महान देहदानी का देश है। यहां परोपकार और लोक कल्याण के लिए अपना सर्वस्व त्यागने की प्राचीन परम्परा रही है। हमें उसी परम्परा को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि समाज के सम्पन्न तथा प्रभावशाली लोगों को देहदान तथा अंगदान के लिए स्वत: आगे आना चाहिए, ताकि आम जनता भी उनका अनुसरण करे। संस्था की गतिविधियों की जानकारी देते हुए आलोक कुमार जी ने बताया कि भारत की प्राचीन जनकल्याण की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए ही आज से 22 साल पहले दधीचि देहदान समिति का गठन किया गया था। समिति के माध्यम से अब तक 5500 लोगों ने शरीर दान करने का संकल्प लिया है। 143 लोगों ने अब तक देहदान किया है तथा 473 लोग नेत्रदान कर चुके हैं। 1 व्यक्ति ने अपनी अस्थियों का दान किया है।
ब्रह्मकुमारी उर्मिला दीदी ने कहा कि समाज के सभी वर्गों को इस पुनीत कार्य में भाग लेना चाहिए, क्योंकि देहदान, अंगदान से बड़ा कोई भी दान नहीं है। कि भारत में सर्वकल्याण को सबसे अधिक महत्व देने की संस्कृति रही है। भारत की प्राचीन जनकल्याण की परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए ही आज हमारे समाज में अत्यंत अवश्यकता है महामंडलेश्वर स्वामीअनुभूतानंद जी कहा किदेह दान कर कोई भी व्यक्ति मृत्यु के बाद भी दूसरों को जिंदगी का उपहार दे सकता है स्वामी जी ने देहदान के प्रति समाज में फैली भ्रांतियों का अध्यात्म के माध्यम से तर्क सहित लोगो की उत्सुकता का निवारण किया । देह दान और अंगदान अधिक से अधिक लोग करे ताकि बड़े पैमाने पर लोगों की प्राण रक्षा की जा सके। देहदान और अंगों के प्रत्यारोपण से संबंधित नियमों को सरल बनाया जाना चाहिए डा वी पी गुप्ता ने देहदान तथा अंगदान के संबंध में कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को जानकारी दी।मंच संचालन वी के शर्मा द्वारा किया गया प्रमोद गुप्ता एवम् मुकेश जैन स्वागताध्यक्ष के रूप में विशेष उपस्थित दर्ज़ की।कार्यक्रम का आयोजन दधीचि देहदान समित्ति केउत्तर पूर्वी विभाग के सुधीर गुप्ता सीमा गुप्ता,योगेन्द्र अग्रवाल द्वारा किया गया

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