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क्या सरकारी मीडिया सरकारी नियंत्रण से बाहर है ?

 

आपको ये खबर पढ़कर आश्चर्य तो होगा लेकिन आज जिस तरह से प्रसारभारती काम कर रहा है, उससे ये संदेह होता है कि एक सोची समझी रणनीति के तहत दूरदर्शन को खत्म करने या फिर सरकार के खिलाफ करने का काम किया जा रहा है। अक्सर मोदी सरकार पर मीडिया को डराकर या फिर खरीदकर अपने पक्ष में काम करवाने का आरोप लगाया जाता है। पर आप अगर सरकारी मीडिया के कार्यप्रणाली देखेंगे तो आपको ये जानकर हैरत होगी कि वहां काम सरकार के दिशा निर्देशों के हिसाब से कम अपनी स्वयंभू नीतियों के हिसाब से होता है। बात शुरू करते हैं प्रधानमंत्री मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट कहे जाने वाले किसान चैनल से।

आजसे  दो वर्ष पूर्व गाजे बाजे और मोटे बजट के साथ किसान चैनल की शुरूआत की गयी थी। कहा गया था किसानों की सभी समस्याओं का समाधान इस चैनल के आने बाद हो जायेगा । लेकिन यहां मौजूद अधिकारियों की मनमानी के चलते, चैनल अजीबो गरीब प्रोग्रामिंग का शिकार हो गया। ऐसे ऐसे कार्यक्रम इस चैनल में बनवायें गए जिनका किसानो और उनकी समस्याओं से दूर दूर का भी वास्ता नहीं था। सरकारी पैसे पर मौज का इससे अच्छा उदाहरण वर्तमान सरकार के कार्यकाल में कोई दूसरा नही होगा। जिस तरह से इस चैनल में कार्यक्रमों की बंदरबांट की गयी उससे इसमें घपलेबाजी का भी संदेह होता है। एक ताजा उदाहरण से इस संदेह की पुष्टि भी होती है।

मामला 13-8-2017 को CPC में चैनल के लिए एक कवि सम्मेलन के लिए इक्विपमेंट, लाइटस, एल ई डी स्क्रीन की हायरिंग का है। 1 दिन में किस तरह सरकारी महकमा काम करता है उससे उपर से देखें तो लगता है कि मोदी सरकार के बनने के बाद महकमें की कार्यक्षमता बढ़ गयी, लेकिन अगर थोड़ा गहराई में जायेंगे तो समझ में आयेगा दाल में कुछ काला तो है।

11 तारीख को तय होता है कि 12 और 13 तारीख के लिए कुछ विशेष इक्विपमेंट की आवश्यकता है। उसी दिन टेंडर भी निकल जाता है, फिर आये टेंडर्स की जांच भी हो जाती है। चैनल के जिम्मेदार लोग इन कंपनियों की जांच भी कर लेते हैं। ये भी इत्तेफाक है कि तीनो कंपनियां इंदिरापुरम की होती हैं और एक ही दिन में कंपनी को काम भी दे दिया जाता है। हो सकता है ये कार्यकुशलता का प्रदर्शन हो। पर अगर कोई अपना ही उंगली उठाये तो संदेह तो होता ही है।

अभी हाल ही में DDG(A) को DG: DDn से  DG:AIR  भेज दिया जाता है। अब आप कहेंगे इसमें गलत क्या है, हो सकता है ये एक समान्य प्रक्रिया हो। लेकिन अगर उन्होंने ADG के कार्यकलापों पर उंगली उठायी हो और उनके द्वारा की गयी वित्तिय अनियमितताओं को उजागर किया हो उसके बाद भी आरोपित व्यक्ति के खिलाफ जांच ना होकर, आरोप लगाने वाले को ही ट्रासंफर कर दिया जाये तो दाल में काला नज़र आना स्वभाविक है। सवाल उठती है क्या आरोपित व्यक्ति को बचाया जा रहा है ? आखिर कौन है जो मोदी के भ्रष्टाचार के खिलाफ समझौता नही मुहिम की हवा निकाल रहा है?  आखिर कौन हिसाब देगा जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा कहां और किस तरह खर्च किया गया है ? क्यूं मोदी सरकार के मंत्री आंखे मूंदे हुए हैं ? किसान चैनल इतने पैसे खर्च करने के बावजूद आज भी किसानों की पहली पसंद नही बन पाया, इसका जिम्मेदार कौन है? किसान चैनल अकेला चैनल नही है जो इस तरह की लालफीताशाही का शिकार है। दूरदर्शन के ओर चैनल इसी तरह की समस्या से जूंझ रहे हैं। उनकी बात फिर कभी।

 

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