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सरकार अपना काम कर रही है। आप भी तो अपना काम कीजिए।

अतुल गंगवार

कोरोना के रुप में आज संपूर्ण विश्व एक ऐसी चुनौती का सामना कर रहा है जिससे निपटने का उसके पास कोई साधन नहीं है। सच पूछा जाये तो केवल अनुमान के सहारे इस अनदेखे दुश्मन से जंग लड़ी जा रही है। प्रत्येक दिन इससे जुड़ा कोई नया समाचार, चाहें वह इसके बढ़ते प्रभाव के बारे में हो या फिर उसके उपचार से जुड़ा हो, देखने सुनने को मिलता है। हमारे देश में अभी तक इसकी स्थिति अन्य देशों से बेहतर तो है, लेकिन खतरे से बाहर नहीं है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के आह्वान पर एक दिन का जनता कर्फ्यू और अब 21 दिन का लॉक डाउन कोरोना वायरस के प्रभाव को रोकने का प्रयास है। जनता कर्फ्यू में जिस तरह से देश की जनता ने प्रधानमंत्री जी के आह्वान को सफल बनाया उससे ये तो साबित हो गया कि देश की जनता इस स्थिति की गंभीरता को समझती है। अब 21 दिन के लॉक डाउन से मोदी जी ने कोरोना के विरूद्ध निर्णायक लड़ाई की शुरूआत कर दी है। इस लड़ाई मे उनकी सेना हैं , हमारे देश की 130 करोड़ जनता। ये लड़ाई इस सेना के सहयोग के बिना नहीं जीती जा सकती है।

जहां एक ओर सारा देश इस लड़ाई में प्रधानमंत्री के साथ हैं वहीं ये भी देखने में आ रहा है कुछ लोग इस लड़ाई में सरकार के साथ खड़े होने के बजाय उसकी आलोचना में लगे हुए हैं। किसी को लगता है कि ये लॉक आउट बहुत पहले हो जाना चाहिए था। किसी को लगता है इस लॉक आउट की घोषणा करने से पहले सरकार को ठीक से तैयारी करनी चहिए थी। किसी को लगता है देश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर सरकार को ध्यान देना चाहिए था। कुछ लोग इस बात को लेकर भी सरकार की आलोचना कर रहें हैं कि उन्होंने लॉक आउट करने से पहले देश की गरीब जनता के बारे में नहीं सोचा कि वह कैसे अपना जीवनयापन करेगी। कुछ लोग खुलेआम लॉकआउट कर्फ्यू का मज़ाक उड़ा रहे है। उनके लिए उनका ऊपरवाला उनकी हिफाजत करने वाला है, इसलिए वह जो मर्जी कर सकते हैं। कुछ लोगों को इस बात से एतराज कि इस समय का सदुपयोग वह अगर सड़कों पर घूम कर करना चाहते हैं, तो पुलिस उनकी पिटाई कर रही है, उनकी आजादी का सम्मान नहीं किया जा रहा है। सोशल मीडिया क्रांति के जमाने में हर आदमी रायबहादुर है, अपनी राय देने के लिए स्वतंत्र।

दोस्तों मुझे लगता है (मेरे अंदर का रायबहादुर भी जाग गया है) की सबसे पहले हमें ये समझना होगा कि ये कोई सामान्य हालात नहीं हैं। जितना जल्दी हम इसको समझेंगे उतना ही हमारे लिए अच्छा। विश्व के कई देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं। ये वह देश हैं जो आबादी में हमसे कम, संसाधनों में हमसे ज़्यादा हैं। लेकिन आज उनकी हालत हमसे बहुत खराब है। क्या वहां की सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर रहीं? क्या वजह है कि तमाम संसाधन होने के बावजूद वहां के नागरिक अपनी जान से हाथ धो रहें हैं ?दिन ब दिन वहां के हालात खराब हो रहे हैं। हम अभी तक खुशकिस्मत हैं कि हम अभी तक बचे हुए हैं। लेकिन कब तक? कब तक…? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। हो भी नहीं सकता, क्योंकि इस सवाल का जवाब किसी ओर के पास नहीं है। उसका जवाब सवाल पूछने वाले के पास ही है। हम तभी तक सुरक्षित हैं जब तक हम अनुशासन में हैं। सरकार ने जो कहा है उसका पालन कर रहे हैं। 21 दिन का लॉक डाउन, यानि अपना लॉक डाउन। शहर बंद करने से कुछ नहीं होगा, बंद करना होगा हमें अपने आपको, तभी इस लॉक डाउन का कोई फायदा हो सकता है।

हमें अपनी सरकार पर भरोसा करना होगा। सरकार जो कर सकती है कर रही है। ये किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। सरकार चाहें केन्द्र की हो या राज्य की सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार काम कर रहीं हैं। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे, गुजरात में विजय रुपानी, राजस्थान में अशोक गहलोत, मध्यप्रदेश में शिवराज, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर,पंजाब में अमरिंदर सिंह, हिमाचल में जयराम ठाकुर, उड़ीसा में नवीन पटनायक, बिहार में नितीश कुमार, झारखंड में हेमंत सोरेन, प.बंगाल में ममता बनर्जी, अरुणाचल में पेमा खांडू, असम में सर्बानंदा सोनोवाल, मणिपुर में बीरेन सिंह, मेघालय में कोनराड संगमा, मिजोरम में जोराम थांगा, नागालैंड में नेफियो रियो, सिक्किम में प्रेम सिंह तवांग, त्रिपुरा में विप्लव देव, गोवा में प्रमोद सावंत, कर्नाटक में बी.एस. येदुरप्पा, आंध्रा में जगन मोहन रेड्डी, तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव, तमिलनाडु में इदापड्डी पलानीस्वामी, केरल में पिनाराई विजयन, पुडूचेरी में वी.नारायण स्वामी के नेतृत्व में सरकारें यथा संभव प्रयास कर रहीं है। लेकिन उनके ये प्रयास तभी सफल होंगे जब हम चाहेंगे।

इस आपदा के समय वक्त है सकारात्मक विचारों के साथ इस लड़ाई को लड़ने का। जीवन रहा तो बहुत वक्त मिलेगा अपने विचारों, आस्थाओं के लिए लड़ने का। देश में कई संगठन इस आपदा से लड़ने के लिए कमर कस चुके हैं। मुंबई में नीलोत्पल मृणाल जैसे अनेक युवा जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए सड़क पर हैं।  इस समय किसी पर संदेह करके हम ये लड़ाई नहीं जीत सकते। एक दूसरे के प्रति भरोसा ही हमारी ताकत है। साधन संसाधन का सदुपयोग करना और करवाना हमारा दायित्व है जिसका हमें पालन करना चाहिए। एक बात ध्यान रखिए अगर हम खुद को नहीं सुरक्षित रखेंगे तो कोई भगवान, अल्लाह, गॉड, वाहे गुरु हमारी रक्षा नहीं कर पायेगा। फेसबुक और तमाम सोशल मीडिया मंचों पर देश और समाज की चिंता करने वालो से मेरी विनती है कि आप सिर्फ अपनी और अपने पड़ोसी की चिंता कर लें, देश सुरक्षित हो जायेगा। सरकार से सवाल पूछने की बजाय हम किस तरह से इस आपदा से लड़ने का काम कर रहें है ये सोचिए।

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