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चीन को समझना और उससे सीखना दोनों जरूरी- राजीव तुली

राजीव तुली- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दिल्ली प्रांत के प्रचार प्रमुख हैं।
दुनियाभर में अपने इंफ्रस्ट्रक्चर और सबसे तेज गति से विकास का दावा करने वाला चीन जैसे विश्व के सामने स्वयं को प्रस्तुत करता है वैसी स्थिति चीन की नहीं हैं। हालांकि इस बात से इंकार कतई नहीं किया जा सकता कि चीन ने पिछले कुछ दशकों में बहुत तरक्की की है। चीन कब क्या करेगा ? कैसे और क्यों करेगा ? इस बारे में अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। यदि चीन के विकास की बात करें तो उसे समझना और सीखना दोनों जरूरी है। चीन की अंदरूनी स्थिति कैसी है। इस बारे में भारतीय बहुत कम जानते हैं। इसका एक कारण यह भी है कि चीन की जो सरकार है वह सिर्फ लोगों को उतना ही बताती है जितना उन्हें जानना चाहिए। अब जबकि चीन के युवा देश से बाहर जाकर दूसरे देशों की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं तो उन्हें समझ और सोच दोनों में वृद्धि हुई है। वह यह भी कहते हैं कि वामपंथी शासन के कारण उनकी संस्कृति खत्म हुई है। हालांकि उन युवाओं की सोच से चीन में कोई क्रांति होगी या चीन के लोग लोकतंत्र के लिए उठ खड़े होंगे यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन आने वाले दशकों में ऐसा हो पाना संभव है लेकिन उसमें अभी काफी वक्त है।
हमारे सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न इस समय यही है कि चीन को कैसे समझा जाए ? हमें चीन को समझने के साथ-साथ काफी कुछ सीखने की भी आवश्यकता है। जब आप चीन जाते हैं जो वहां का विकास देखते हैं? वहां की व्यवस्था देखते हैं? हमारे देश में जहां एक हजार किलोमीटर की दूरी तय करने में व्यक्ति को 15 से 16 घंटे का समय लगता है वहीं चीन में इस दूरी को तय करने में चार घंटे लगते हैं।

उदाहरण के तौर पर यदि एक हजार लोग एक साथ वहां ट्रेन में सफर कर रहे हैं तो एक हजार किलोमीटर की दूरी तय करने में उन्हें चार घंटे लगते हैं। यानी अपने दस हजार वर्किंग हॉवर चीन के लोगों ने बचा लिए। बहरहाल ये सिर्फ एक उदाहरण है, इसके अलावा और भी कई चीजें ऐसी हैं जिनको अपने यहां इंप्लीमेंट किए जाने की जरूरत है। चीन की फैक्टरियों में पुरुष और महिला बराबर काम करती हैं। दोनों के वेतन भी एक जैसे हैं। फिर चाहे वह फैक्टरी की लेबर हो या फिर मैनेजर। हर स्तर पर एक सामान व्यवहार किया जाता है। जब आप चीन के युवा वर्ग से रूबरू होते हैं जो इंटरनेट की दुनिया में जीता है और चीन के बाहर जाकर पढ़कर आया है तो पता चलता है कि उनके मन में एक कसक है। वे दबी जबान से इस बात को कहते हैं कि वामपंथी शासन ने उनकी संस्कृति को बहुत नुकसान पहुंचाया है। चीन में लोगों के मनोरंजन के लिए होने वाले नाटकों में उनकी पुरानी संस्कृति और वेशभूषा की झलक दिखाई देती है लेकिन वह सिर्फ वहां के लोगों के लिए मनोरंजनभर है। उन्हें देखकर कोई नई सोच या फिर विचार लोगों के मन में आता हो नहीं दिखता। इसका सबसे बड़ा कारण वहां की सरकार है। चीन की सरकार लोगों की सोच, लोगों का खान-पान, वेशभूषा सबकुछ तय करती है। यहां सोचना मना है। फिलहाल किसी दूसरी विचारधारा के लिए चीन में कोई जगह नहीं है।
उदाहरण के तौर पर चीन में मेंडरिन और कोंटोनिज दो भाषाएं बोली जाती हैं। पूर्वी चीन और अन्य बड़े हिस्से में मेंडरिन बोली जाती है। जबकि दक्षिण पूर्व में कोंटोनिज बोली जाती है। दोनों ही क्षेत्रों के लोग एक दूसरे के इलाके की भाषा नहीं समझते, लेकिन चीन में जो सिनेमा है और चीन के जितने भी चैनल हैं वह मेंडरिन भाषा में है। चीन की कोशिश है कि आने वाले समय में देश में सिर्फ एक ही भाषा मेंडरिन बोली जाए। चीन में सिर्फ एक ही अंग्रेजी चैनल है जो चीन के लोगों के लिए नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए है। उस चैनल के प्रोग्राम देखें तो हर प्रोग्राम के अंत में एक संदेश होता है कि हम बेहतर हैं, हमने यह किया ? चीन इतनी तेजी से विकास कर रहा है ? इस चैनल के माध्यम से चीन दुनिया के सामने एक भ्रम खड़ा करने की कोशिश करता है कि वह सर्वश्रेष्ठ है।
उदाहरण के तौर पर जब आप चीन में बुलेट ट्रेन परियोजना को देखते हैं तो पाते हैं कि उसके बराबर में एक और लाइन बनाई जा रही है। जब आप उसके बारे में पूछते हैं तो बताया जाता है कि यह अगले 50 साल की योजनाओं को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है। एक बार जाने पर चीन का विकास देखकर किसी का भी बहुत प्रभावित होना जायज है, लेकिन जब आप लगातार चीन जाते हैं तो वास्तविकता पता चलती है।
मेरा अक्सर व्यापार के सिलसिले में चीन जाना होता है। लगातार चीन दौरों के दौरान पिछले तीन-चार वर्षों में एक बात जो देखने में आती है कि परियोजनाएं तो चीन में बहुत सारी हैं लेकिन वह रूकी हुई हैं। बुलेट ट्रेनों की नई लाइन चार पहले जैसी थी वैसी ही पड़ी हुई दिखाई देती है। बड़ी—बड़ी फैक्टरियों में काम होता दिखाई नहीं देता। बहुमंजिला हाउसिंग प्रोजेक्ट आधे बने हुए दिखाई देते हैं।
एक सबसे बड़ा कारण अंतराष्ट्रीय व्यापार में चीन की साख गिरना है। जैसा कि मैंने पहले ही लिखा कि चीन कब क्या करेगा ? कैसे और क्यों करेगा ? इस बारे में अंदाजा नहीं जा सकता। चीन की ऐसी ही नीतियों चलते उस पर पूरी तरह कोई भरोसा नहीं करता। उदाहरण के तौर पर चीन लेदर का डूप्लीकेट लेदराइट बनाता है। उसकी सबसे ज्यादा खपत अफ्रीका में होती है, लेकिन चीन के व्यापारियों से वही माल साउथ अफ्रीका के व्यापारी केवल दो प्रतिशत खरीदते हैं। जबकि चीन से 90 फीसद वही माल भारत के व्यापारी खरीदते हैं और अफ्रीका के व्यापारी उसी माल को भारत के व्यापरियों से खरीदते हैं लेकिन चीन से नहीं ? चीन के बड़े शहरों जैसे बीजिंग, शंघाई आदि की बात न करके चीन के छोटे शहर जैसे वूशी, फेंसियान, लेंगशिया की बात करें तो भी आपको वहां की व्यवस्था हमारे महानगरों के बड़े शहरों से बेहतर नजर आती हैं। यह हमें चीन से सीखने की जरूरत है। वैश्विक परिपेक्ष्य में दुनिया को भारत पर विश्वास है जबकि चीन पर नहीं। ऐसे में भारत एशिया का सिरमौर हो सकता है। बस थोड़ा व्यवस्थित होने की जरूरत है।⁠⁠⁠⁠

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