You are here
Home > NEWS > सस्ती दवाओं की हकीकत- गरीब को नही मिल रही सस्ती दवाएं

सस्ती दवाओं की हकीकत- गरीब को नही मिल रही सस्ती दवाएं

नहीं मिल रहीं गरीबों को सस्ती दवा

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर गरीबों को सस्ती दवाएं और सर्जिकल उपकरण उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना को बड़े पैमाने लागू कराने का फैसला किया गया था। मार्च 2017 तक तीन हजार जन औषधि केन्द्र खोलने का ऐलान किया गया था। सस्ती दवाओं की दुकानें खुली तो दवाएं नहीं मिल रही हैं। प्रधानमंत्री की गरीबों को सस्ती दवाएं दिलाने की योजना को नोडल एजेंसी बीपीपीआई के अफसरों ने असफल कर दिया। यह सब किया जा रहा है दवा कंपनियों के असर के कारण। प्रधानमंत्री तो मुनाफाखोर दवा कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करना चाहते हैं पर कुछ अफसर इन कंपनियों से ही मिले हुए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल में सूरत में एक अस्पताल के उद्घाटन के अवसर पर कहा था कि आज मध्यम वर्ग के घर में कोई बीमार हो जाए तो वो बाकी काम नहीं कर पाता। न बेटी की शादी कर पाता है और न ही घर ले पाता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी है, सबको लाभ मिले। अटलजी की सरकार के बाद हमारी सरकार हेल्थ पॉलिसी लेकर आई है मोदी ने मुनाफाखोर दवा कंपनियों पर भी हमला बोला और कहा कि दवा कंपनियां इंजेक्शन-दवाइयों को महंगा बेच रही थीं। सरकार ने करीब 700 दवाओं की कीमतें कम कराई हैं। हार्ट की बीमारियों में स्टेंट की जरूरत पड़ती है। 40 हजार के स्टेंट की कीमत 6-7 हजार में बेचना पड़ेगा ताकि गरीब को दिक्कत न हो।”

 

मोदी ने कहा था कि चिकित्सक इस तरह से पर्ची लिखते हैं कि गरीब लोग उनकी लेखनी समझ नहीं पाते और वे ऊंचे दामों पर निजी दुकानों से दवाएं खरीदते हैं। लोगों को सस्ती दवा मिले, इसके लिए भी काम कर रहे हैं। डॉक्टर जेनरिक दवाएं लिखें, इसके लिए कानून बनेगा। केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार भी ने कई बार दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी पर लगाम लगाने की बात कही है। गरीबों और जरूरतमंदों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए 2008 में यूपीए सरकार ने प्रधानमंत्री जन औषधि योजना शुरु की थी। 2008 से 2014 तक केवल 80 जन औषधि स्टोर ही देश में खुल पाए। मोदी सरकार के आने के बाद इस योजना का नाम कुछ अरसा पहले प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि (पीएमबीजेपी) परियोजना कर दिया गया। इस परियोजना के तहत ब्रांडेड दवाइयों के मुकाबले सस्ती और क्वालिटी की दवाई देने का फैसला किया गया। जोर-शोर से पूरे देश में जन औषधि स्टोर खोले जा रहे हैं। स्टोर खुल भी रहे हैं और साथ ही बन्द भी हो रहे हैं। बताया जा रहा है कि परियोजना की नोडल एजेंसी ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसयू ऑफ इंडिया (बीपीपीआई) में व्याप्त भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के कारण गरीबों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध कराने  का मोदी का सपना पूरा नहीं हो पा रहा है। इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने नीति आयोग, स्वास्थ्य मंत्रालय और डिपार्टमेंट ऑफ फार्मा पर दवा कंपनियों से मिलीभगत का आरोप लगाया है। मंच का कहना है कि फार्मा विभाग के तहत काम करने वाली बीपीपीआई में भी दवा कंपनियों के एजेन्ट बैठे हुए है। बीपीपीआई के अधिकारी दवा कंपनियों के इशारे पर प्रधानमंत्री मोदी की गरीबों को सस्ता इलाज कराने की परियोजना को असफल करने में लगे हुए हैं। सबसे बडा खुलासा तो यह हुआ है कि जब जन औषधि स्टोरों पर दवाइयां ही नहीं होंगी तो गरीबों को सस्ता इलाज कैसे मिलेगा। जेनरिक दवाइयों की किल्लत बढ़ाते हुए बीपीपीआई ने कुछ महीने पहले नियमों के विपरीत दूसरी कंपनियों की दवाएं भी बेचने की मंजूरी दी थी। जन औषधि स्टोरों पर दवाइयों के साथ अन्य सामान भी बेचने की अनुमति दी गई है। हालत यह है कि जन औषधि केंद्रों पर दवाइयां तो है नहीं पर पानी बोतल, कोल्ड ड्रिंक, बिस्कुट और अन्य सामान बेचा जा रहा है। केंद्र सरकार ने पिछले साल फरवरी में मार्च 2017 तक तीन हजार जन औषधि केंद्र खोलने का लक्ष्य रखा था। मार्च 2017 तक केवल एक हजार स्टोर ही खुल पाए थे। उनमें से कई स्टोर तो केवल कागजों पर चल रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की नाराजगी के बाद कुछ अभी तक 1600 केंद्र ही खुल पाए हैं। प्रधानमंत्री की सख्ती के बाद मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने सभी डाक्टरों को जेनरिक दवाएं लिखने के निर्देश दिए थे। डॉकटर पहले तो जेनरिक दवाएं नहीं लिखते और अगर लिख भी दें तो दवाएं उपलब्ध नहीं हैं।

दवा कंपनियों के प्रतिनिधियों का बीपीपीआई में दबदबा

प्रधानमंत्री ने हाल ही में गुजरात के सूरत में कहा था कि दवा कंपनियों के मनमानी पर रोक लगाने के साथ ही दवाइयां सस्ती करने की घोषणा की थी। इसके लिए उन्होंने कानून बनाने की बात भी कही। मोदीजी ने कहा था कि मैंने दवाईयां सस्ती की तो कई कंपनियां मुझसे नाराज हो गईं। लेकिन हम दवाईयों के सस्ते होने को लेकर जल्द ही कानून लेकर आएंगे। हैरानी की बात है कि बीपीपीआई में ही दवा कंपनियों के इशारे पर काम करने वाले लोगों को अति महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। बीपीपीआई में दवा कंपनियों में बड़े पदों पर काम करने वाले श्रीनिवास लंका को लगातार चीफ मेंटर के पद पर बिठाया गया है। श्रीनिवास लंका की बड़ी  दवा कंपनियों के मालिकों से गहरी दोस्ती हैं। एक विवादास्पद दवा कंपनी में काम कर चुके लंका पर पहले भी विवादित आरोप भी लग चुके हैं। लंका की पसंद पर ही 68 साल के बिप्लब चटर्जी को बीपीपीआई का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाया गया है। बिप्लब चटर्जी भी फार्मा कंपनियों में ही बड़े पदों पर रहे हैं। लंका और चटर्जी मिलकर प्रधानमंत्री मोदीजी की गरीबों को सस्ता इलाज उपलब्ध कराने वाली योजना को असफल करने में लगे हुए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि जन औषधि केंद्रों में बीपीपीआई से घटिया दवाइयों की सप्लाई की जा रह है। बड़ी संख्या में तो दवाइयां पहुंचाने में ही जानबूझकर देरी की जाती है। ये सब दवा कंपनियों की प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना को असफल करने के लिए किया जा रहा है। इन लोगों ने रसायन और उर्वरक मंत्री माननीय श्री अनंत कुमार के कार्यालय में अपनी पैठ बना रखी है। मंत्रीजी के कार्यालय में तैनात कुछ कर्मचारी लंका और चटर्जी को पूरी जानकारी देते रहते हैं। मंत्रालय के अधिकारियों के कामकाज की पूरी जानकारी लंका और चटर्जी को मिलती रहती है। एक तरह से बीपीपीआई रिटायर अफसरों और कर्मचारियों का अड्डा बनता जा रहा है। चीफ मेंटर दवा कंपनियों से रिटायर होने के बाद लगातार कई साल से यहीं बने हुए हैं। मुख्य कार्यकारी अधिकारी के अलावा निदेशक वित्त और निदेशक खरीद-फरोख्त भी रिटायर होने के बाद लंबे अरसे से जमे हुए हैं। इनके कार्यकाल में बीपीपीआई योजना को सफल नही बना सका था। अब भी इन्हीं लोगों के जिम्मे यह परियोजना सौंपी गई है। इन लोगों का प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी परियोजना को सफल करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। एक तरफ दो जन औषधि केंद्रों में दवाएं नहीं हैं और दूसरी ओर बीपीपीआई के गोदामों में दवाइयां सड़ रही हैं। गोदामों में 50 करोड़ ज्यादा ऐसी दवाएं खरीद कर सड़ने के लिए डाल दी गई, जिनकी बाजार में ज्यादा मांग नहीं हैं। बिक्री न होने पर मियाद खत्न होने के कगार पर पहुंची दवाइयों को  फ्री में देने की योजना बनाई जा रही है।

 

खरीद प्रक्रिया

गरीबों को सस्ती दवाइयां मुहैया कराने के लिए बीपीपीआई के खरीद-फरोख्त विभाग की सबसे बड़ी भूमिका रहती है। मार्केट की मांग की अनुसार दवाइयों की खरीद की बजाय अपनी जेब भरने के हिसाब से दवाइयों की खरीद की जाती है। यह चौंकाने वाली जानकारी मिली है कि जिन दवाइयों की जन औषधि केंद्रों पर सबसे ज्यादा बिक्री होती है, उन दवाइयों के टेंडर ही नहीं दिए जाते हैं। जिन दवाइयों की सबसे कम कम बिक्री होती है, उनसे बीपीपीआई के गोदाम भरे हुए हैं। भारी मात्रा में ऐसी दवाइयों के इस्तेमाल की तारीख भी निकल रही है। बीपीपीआई में बिक्री के आधार पर दवाइयों का कोई वर्गीकरण नहीं किया गया है। बाजार की मांग के अनुसार दवाइयों का वर्गीकरण किया जाता है। यानी जिस दवा की ज्यादा मांग,उसकी ज्यादा खरीद की जाती है। बीपीपीआई में नियमों के विपरीत अपनी मर्जी से दवाइयों की खऱीद-फरोख्त की जाती है। इससे करोड़ों रुपये का नुकसान सरकार को हो रहा है। बीपीपीआई के अफसरों ने पिछले तीन महीनों में 37.50 करोड़ रुपये की दवाइयां बिना मांग के खरीदी हैं। खरीदी गई दवाइयों में 50 फीसदी से ज्यादा की कोई मांग नहीं है। बीपीपीआई की सूची में 563 दवाइयों में से केवल 25 दवाइयां ही खरीदी गई हैं।

नियमों के अनुसार ज्यादा बिकने वाली दवाइयों की खऱीद पर्याप्त मात्रा की जानी चाहिए पर ऐसा नहीं हो रहा है। केंद्रीय गोदाम एवं सीएफए में ज्यादा बिकने वाली दवाइयों का दो महीने का स्टाक होना चाहिए। पर ऐसा नहीं किया जा रहा है। इस कारण जन औषधि केंद्रों पर दवाइयां न मिलने के कारण गरीबों को सस्ती दवाइयां उपलब्ध नही हो पा रही हैं।

चार करोड़ रुपए से ज्यादा की दवाइयां मुहैया कराने वाली कंपनियों का कोई रिकार्ड भी बीपीपीआई में नहीं रखा गया है। हालत यह है कि दवाइयों की खरीद नियमों के विपरीत की जा रही हैं। टेंडर की शर्तों को पूरा न करने वाले दवा निर्माताओं को भी आर्डर दिए गए हैं। ऐसे दवा निर्माता पकड़ में न आ पाएं, इस कारण उनका पूरा रिकार्ड गायाब कर दिया जाता है।

गोदाम में रखी गई दवाइयों की खरीद और स्टोरों पर भेजने का भी कोई आंतरिक रिकार्ड नहीं रखा जाता है। इस कारण बड़े पैमाने पर घपला हो रहा है। वेयर हाउस में पांच करोड़ से ज्यादा की एक्सपाइरी दवाइयां सड़ रही है। जानकारी मिली है ऐसी दवाइयों को नई ताऱीख और बैच लगाकर फिर से बेचने की तैयारी की जा रही है। इससे लोगों की जान को खतरा हो सकता है। यह सब अन्दरूनी तौर पर कोई ऑडिट न होने के कारण हो रहा है।

सबसे हैरानी वाली बात यह है कि जिस कीमत पर दवाइयां बाजार में बेची जाती हैं,उससे ज्यादा कीमत पर दवाइयां दवा निर्माताओं से ली जाती हैं। उदाहरण के लिए एक दवा की एमआरपी 36 रुपये है, उसकी 42 रुपये पर खरीदा गया है। ऐसे एक नहीं, कई उदाहरण है। इस 42 रुपये में लगभग 40 फीसदी कमीशन, मार्जिन में खर्च होता है। छह रुपये तो हर पत्ती पर सीधा नुकसान हुआ। इसके अलावा एमआरपी का 40 फीसदी कमीशन और मार्जिन पर खर्च होता है। इस तरह से बीपीपीआई को बडे् पैमाने पर नुकसान हो रहा है।

यह ध्यान देने की बात है कि पब्लिक सेक्टर की कंपनियों से सामान न खरीद कर अन्य ऐसी दवा कंपनियों से दवाइयां खरीदी जा रही हैं जिनके पास एफडीआई प्रमाणपत्र नहीं है। पीएसयू को दरकिनार करते हुए निजी दवा निर्माताओं से दवाइयां खरीदी जा रही हैं। जिन दवा कंपनियों की दवाइयां गुणवत्ता पर खरी नहीं उतरती हैं,उनको काली सूची में डालने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। इस कारण बिना गुणवत्ता वाली दवाइयों के इस्तेमाल के कारण मरीजों को फायदा नहीं होता है। इसी वजह से बीपीपीआई के साथ प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना की साख नहीं बन पा रही है।

बीपीपीआई द्वारा खरीदी गई दवाओं और अन्य सर्जिकल वस्तुओं की खराब गुणवत्ता के संबंध में शिकायतें भी मिली  हैं। यह भी जानकारी दी गई है कि दवाइयों की गुणवत्ता की सही तरीके से जांच नहीं कराई जाती है। गोदाम तक पहुंचने वाली दवाइयों की पूरी प्रक्रिया में  परीक्षण और प्रसंस्करण में आमतौर पर 2-3 सप्ताह लगते हैं,लेकिन कुछ विक्रेताओं के लिए नियमों को दरकिनार करते हुए एक हफ्ते से कम समय में मंजूरी दे दी जाती है। जांच रिपोर्ट कब आती है और कहां से आती है, इस बारे में सबकुछ गोपनीय रखा जाता है। इसी कारण परियोजना की गिरी साख फिर नहीं बन पा रही है।

दवाइयों का भंडारण भी बिना लाइसेंस किया जा रहा है। बीपीपीई के पास भंडारण के लिए एक दवा लाइसेंस नहीं है। बीपीपीआई के केंद्रीय वेयरहाउस में केवल 20 फीसदी दवा का ही भंडारण हो पाता है। बाकी 80 फीसदी दवाएं आईडीपीएल की लाइब्रेरी और अन्य स्थानों पर रखी जाती हैं। इन दवाइयों को रखने के लिए कोई ड्रग लाइसेंस नहीं लिया गया है। यह बहुत बड़ी लापरवाही है। करोड़ो रुपये की दवाई बिना लाइसेंस रखना  भी एक अपराध है। केंद्रीय भंडार में कुशल कर्मचारी भी नहीं रखे गए हैं। इस कारण दवाइयों का सही तरीके से वितरण नहीं हो पा रहा है। वितरकों को पूरी दाम सही तरीके से मिले,इसके भी इंतजाम नहीं है। वितरकों द्वारा कई बार कम दवा मिलने की शिकायत मिली है। गोदामों में दवाइयों को आग और पानी से बचाने के इंतजाम भी नहीं हैं। गोदामों में बेकार का सामान भी रखा हुआ है। एक्सपाइरी दवाएं भी भारी मात्रा में रखी गई हैं। नियमों के अनुसार बैच,एमआरपी आदि के बारे में दवाइयों पर स्टीकर नहीं लगाया जा सकता है। पर ऐसा लगातार किया जा रहा है।

वर्तमान में गोदाम में लगभग रु 52.40 करोड़ की दवाएं रखी गई हैं। इनमें से केवल 30 करोड़ की दवाओं का बीमा कराया गया है। गोदामों बाहरी व्यक्ति बिना किसी अनुमति के कर्मचारियों की मिलीभगत से अंदर चले जाते हैं। इनमें दवा कंपनियों के लोग भी शामिल हैं।

पांच करोड़ से ज्यादा की दवाइयों की मियाद लगभग एक महीने में खत्म होने वाली हैं। पांच करोड़ की दवाइयां एक महीने बाद बेकार हो जाएंगी। इन दवाइयों की फ्री बांटने की योजना बनाई जा रह है।

 

उपस्कर और आपूर्ति विभाग में भी घपला-बीपीपीआई का मौजूदा आपूर्ति प्रबंधन इस योजना की सफलता में सबसे बड़ी रुकावट है। यह योजना में कोई बदलाव नहीं किया जा रहा है। 2012 में हुए ऑडिट के अनुसार  वितरकों की नियुक्ति की प्रक्रिया और सीएंडएफ दिशा-निर्देशों के अनुसार बिल्कुल भी पारदर्शी नहीं है। विपणन टीम को भी वितरण या सी एंड एफ आवंटन के लिए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने को नहीं कहा गया। कई बार ऐसा हुआ है कि वितरकों द्वारा भेजे जाने वाले परिवहन परमिट रसद विभाग द्वारा गुम कर दिए जाते हैं। लापरवाही और भ्रष्टाचार के कारण खुदरा वितरकों तक दवाई पहुंचाने में बहुत देरी होती है। केंद्रीय वेयर हाउस और रसद टीम के बीच आंतरिक समन्वय बहुत खराब है। तमाम औपचारिकताओं को पूरा करने के बावजूद माल समय पर नहीं भेजा जाता है। दवाइयों के वितरण के लिए वितरकों के क्षेत्र तय नहीं है। एक वितरक दूसरे वितरक के क्षेत्र में दवाइयों की सप्लाई कर देता है। नए वितरकों की नियुक्ति के बारे में बैकएंड टीम को जानकारी नहीं दी जाती है। वितरकों को 30 दिन के क्रेडिट पर रिटेल आउटलेट्स के लिए सामान देने के नियम हैं। वितरक खुदरा दुकानों से अग्रिम भुगतान लेकर सामान देते  हैं। कुछ जरूरी दवाओं की समय से डिलीवरी को सुनिश्चित करने के लिए कोई निगरानी तंत्र नहीं है।

बैकएण्ड सपोर्ट सिस्टम: बैकएण्ड सपोर्ट सिस्टम ऐसे लोगों के जिम्मे हैं, जिन्हें कोई अनुभव नहीं है। स्टोर में रखी दवाइयों के बारे में भी उन्हें कोई जानकारी नहीं होती है। स्टोर खोलने के लिए आए आवेदकों के बारे में भी कोई जानकारी नहीं मिलती है। एक ही जगह दो से ज्यादा लोगों को केंद्र खोलने की अनुमति दी गई है। इस कारण भी स्टोर के आवेदकों में नाराजगी है। केंद्र खोलने के लिए आए आवेदनों के बारे में भी सही डाटा नहीं मिला है। 50 फीसदी से ज्यादा आवेदकों को डाक या ईमेल द्वारा मंजूरी नहीं मिली है पर बीपीपीआई की तरफ से दावा किया जा रहा है कि केंद्र खोलने की मंजूरी दे दी गई है। बड़ी संख्या में ऐसे केंद्र भी हैं जो केवल कागजों पर चल रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों में बीपीपीआई ने 12,000 जन औषधि केंद्र खोलने के लिए 35 से अधिक गैर सरकारी संगठनों के करार किए हैं। करार करने के लिए बडे-बड़े आयोजन करके लाखों रुपए खर्च किए गए पर जन औषधि स्टोर नहीं खुल पाए।

स्वदेशी जागण मंच ने प्रधानमंत्री से शिकायत की

दवाइयों की ऊंची कीमतों को लेकर आरएसएस से जुड़े संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्टी लिखी है। इस चिट्ठी में स्वदेशी जागरण मंच ने स्वास्थ्य मंत्रालय,डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल, नीति आयोग और डीआईपीपी पर मिलीभगत के आरोप लगाए है। नीति आयोग पर निशाना साधते हुए स्वदेशी जागरण मंच  ने लिखा है कि नीति आयोग फार्मा कंपनियों से साथ मिलकर लॉबी कर रहा है। स्वदेशी जागरण मंच की चिट्ठी में आगे कहा गया है कि जरूरी दवाइयों की ऊंची कीमत को लेकर चिंता बनी हुई है। ऊंची कीमत की वजह से लाखों लोगों की जिंदगी दांव पर है। फार्मा कंपनियां 500-4000 फीसदी तक मुनाफा कमा रही हैं। प्राइस कंट्रोल को लेकर मौजूदा फॉर्मूला अव्यावहारिक है। फार्मा विभाग पर दवा कंपनियों का काफी प्रभाव है। गरीबों को सस्ते में दवा देने के लिए बनी कमिटी पर भी दबाव है। इस मामले में नीति आयोग के छुपे हुए हित हैं। नीति आयोग प्राइस कंट्रोल रेगुलेटर को खत्म करना चाहता है। नीति आयोग के काम गरीब और देश विरोधी हैं। नीति आयोग फार्मा कंपनियों के लिए लॉबी कर रहा है। नीति आयोग स्वास्थ्य मंत्रालय,डीआईपीपी की मिलीभगत है। एनपीपीए को और मजबूत बनाए जाने की जरूरत है।

 

 

Leave a Reply

Top