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‘संजू’–आधी हक़ीकत आधा फसाना

अतुल गंगवार

 

किसी फिल्म के रिव्यू में इतनी देरी से फिल्म की संभावनाओं पर कोई फर्क नही पड़ता। लेकिन ये फिल्म कुछ ऐसी है कि मैं देर से ही सही इसका रिव्यू करने को मजबूर हो गया हूं। ये कहानी है प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता संजय दत्त के जीवन की। संजय दत्त की ज़िन्दगी में कई उतार चढ़ाव आये। इन्हीं उतार चढ़ावों को आधार बनाकर संजू की कहानी का ताना बाना बुना गया है। कहानी के पूर्वाध यानि इंटरवल से पहले उनकी नशे की लत्त, उससे उन्हें होने वाली परेशानी और उस संघर्ष को दिखाया गया है जिससे वो उस लत्त से छूटते हैं। इंटरवल के बाद की कहानी उनके टाडा में फंसने की घटना दिखाती है। यहां संघर्ष है उनका आतंकवादी होने के आरोप से लड़ने का।

अगर हम फिल्म को उपरी तौर पर देखें तो साफतौर पर ये फिल्म संजय दत्त की छवि को बेहतर बनाने के लिए बनाई गयी है। फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बता रहें हैं कि ये फिल्म दर्शकों को पसंद आ रही है। पसंद आने के दो कारण हैं पहला संजय के जीवन को रोचक प्रस्तुति और दूसरा रणबीर कपूर का शानदार अभिनय। रणबीर कपूर देश के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में से एक हैं उन्होंने संजय दत्त के किरदार को प्रभावशाली ढंग से निभाया है। तो हम कह सकते हैं कि फिल्म के निर्माता, निर्देशक अपने उद्देश्य में सफल हुए हैं। उद्देशय संजय दत्त की छवि सुधारने और पैसा कमाने की। लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि पैसा कमाने के लिए फिल्मकार किसी भी विषय पर फिल्म बना सकते हैं क्या? संजय दत्त का जीवन विरोधाभासों से भरा रहा है। सच पूछिए तो यदि ये सुनील दत्त के बेटे नही होते तो इनकी कहानी इंटरवल से पहले ही खत्म हो गयी होती। ये सुनील दत्त ही थे जो पहले संजय दत्त को नशे के जाल से मुक्त करा कर ले आये और बाद में उन्हें आतंकवादी होने के कलंक से बचा लिया। ये फिल्म संजय के लिए नही सुनील दत्त के लिए देखनी चाहिए।

फिल्मकार के पास फिल्म में सिनेमेटिक आज़ादी लेने का अधिकार है। राजकुमार हिरानी ने भी लिया है लेकिन ये अजीब संयोग है कि ये सिनेमेटिक आज़ादी कुछ ख़ास जगहों पर ली गयी है। जैसे 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के प्रसंग का उल्लेख किया गया है और बाद में दंगो का जिक्र किया गया है। इन दंगो में ये दिखाया गया है कि सुनील दत्त दंगा पीड़ित बस्तियों में मदद पंहुचा रहें हैं (इत्फाकन ये सारी बस्तियां मुसलमानों की हैं यानि पीड़ित मुसलमान हैं)।

इस संदर्भ में राजकुमार हिरानी एक बात का उल्लेख करना भूल गए कि मुंबई में दंगो की शुरूआत राधाबाई  चाल से हुयी थी जहां 7 जनवरी 1993 की रात 9 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। इसमें 2 बच्चों सहित 6 महिलाएं और 3 पुरूष थे। इसमें 6 लोग मारे गए थे। यहां से मुंबई में दंगों की शुरूआत हुयी थी। प्रतिहिंसा में मुसलमानों पर भी हमले हुए। फिल्म में कुछ इस तरह दिखाया गया है कि लगता है बाबरी विध्वंस के बाद हिंदुओं ने मुसलमानों पर हमले करके उन्हें नुक्सान पंहुचाया। एक ओर शख्स का जिक्र फिल्म में आता है- टाइगर मेमन जो मुंबई बम बलास्ट का मुख्य अभियुक्त था। फिल्म में बताया जाता है कि टाइगर मेमन ने मुंबई में बम बलास्ट इसलिए करवाये क्योंकि दंगो में उसकी संपत्ति को भी नुक्सान पंहुचा था। हिरानी जी इस बात का उल्लेख करना भूल गए कि टाइगर मेमन दाउद का आदमी था, एक अपराधी था। फिल्म देख कर ऐसा लगता है कि टाइगर एक आम आदमी था उसकी संपत्ति को दंगों में नुक्सान पंहुचा और उसने बदला लेने के लिए मुंबई में बम फुड़वा दिए। हिंदुओं द्वारा संजय दत्त को धमकी मिली और उसने पहला काम ये किया कि सुरक्षा के लिए AK-56 राइफल रख लीं। पहले 3 बाद में 2 वापिस कर दीं। जिससे की संजय दत्त की इमेज को बचाया जा सके और उसके किरदार की मासूमियत बरकरार रहे।

ये बाज़ार का युग है। इस बाज़ार में हर वो चीज है जो बिक सकती है। फिर वो चाहें रिश्ते हों, किसी के जज़्बात हो, घर का सामान हो या इंसान हो कुछ भी। एक नशेबाज की कहानी भी बिक सकती है, एक आतंकी गतिविधियों? में शामिल इंसान की कहानी भी बिक सकती है बशर्ते वो मशहूर हो। संजय दत्त की कहानी देख कर एक बात तो समझ में आती है कि संजय ने अपनी ज़िन्दगी से आज भी कुछ नही सीखा। अगर सीखा होता तो कुछ तो ईमानदारी दिखायी होती। उसने नशा करना इसलिए शुरू किया कि वो अपने पिता से नाराज़ था। वो AK-56 घर में इसलिए लाया क्योंकि वो अपने पिता के लिए चिंतित था। वो दोस्त की प्रेमिका के साथ सो सकता था। वो अपनी होने वाली बीवी के गले में मंगलसूत्र की जगह टॉयलेट सीट डाल देता है क्योंकि वो नशे में था। वो बड़े गर्व से अपनी बीवी के सामने ये कबूल करता है कि वो 350 लड़कियों के साथ सोया है। उसके हर गलत काम के पीछे किसी दूसरे का हाथ है। कहीं पिता जिम्मेदार है, कहीं दोस्त जिम्मेदार हैं। कहीं होने वाला ससुर जिम्मेदार है और कहीं मीडिया जिम्मेदार है। बस मासूम है तो सिर्फ संजय दत्त। माफ कीजिएगा देश में लाखों युवा आज भी मिलेंगे जो उपर लिखी किसी ना किसी वजह से ऐसी कई कहानियां जी रहें हैं, लेकिन उनकी कहानियां बिकती नही हैं क्योंकि वो संजय दत्त नहीं हैं। इसलिए कोई हिरानी उनपर फिल्म नहीं बनायेगा।

‘संजू’ बेटे के नजरिए से देखा जाये तो वहियात फिल्म है (यहां मैं विषय की बात कर रहा हूं, पैसे कमाने की नही, कमाई के मामले में तो फिल्म रिकार्ड तोड़ धंधा कर रही है।)। हां मुझे फिल्म में सुनील दत्त के नजरिए से एक आशा की किरण दिखायी देती है। एक ऐसा इंसान जिसने अपनी बीवी के लिए संघर्ष किया। अपने बेटे को नशे के जाल से निकाला। अपने बेटे को आतंकवादी होने के दंश से बचाया और खासतौर पर उनके ‘उस्तादों’ का मैं कायल हो गया। क्या बात है, ज़िन्दगी में प्रेरणा लेने के लिए उनके उस्ताद किसी भी वक्त, कहीं भी, किसी को भी एक नयी रोशनी दिखा सकते हैं।

अभिनय फिल्म का सबसे सशक्त पक्ष है। रणबीर कपूर ने संजय दत्त को पर्दे पर जिस जीवंतता से जिया है अगर स्वयं संजय दत्त इस फिल्म में काम कर रहे होते तो भी वो दर्शकों से उतना नही जुड़ पाते जितना रणबीर कपूर ने जोड़ा है। संजू के दोस्त के किरदार में विकी कौशल ना केवल जमें हैं बल्कि कई दृश्यों में वो सामने वाले अभिनेता को कड़ी टक्कर देते हुए नज़र आये हैं।परेश रावल सुनील दत्त के किरदार में विश्वसनीय लगे हैं। मनीषा कोइराला ने छोटी सी भूमिका को अच्छे से निभाया है। इस फिल्म में हीरोइन का उतना ही महत्व है जितना संजय दत्त की ज़िन्दगी में आयी 350 लड़कियों का है।

‘संजू’ एक बेहतर फिल्म बन सकती थी। लेकिन सिर्फ इसलिए नही बन सकी क्योंकि इसका उद्देश्य संजय दत्त की इमेज बनाना था।

मेरे लिए ये फिल्म सुनील दत्त की फिल्म है। एक ऐसे पिता की कहानी जो हर वक्त अपनी औलाद के साथ खड़ा रहा। उनकी हिम्मत और संघर्ष कईयों के लिए प्रेरणा का काम करेगा। एक पति, एक पिता, एक अभिनेता, एक नेता के रूप में वो हमेशा अनुकरणीय रहेंगे। संजय दत्त को गर्व होना चाहिए वो सुनील दत्त के बेटे हैं। सुनील दत्त के ‘उस्ताद’ लोगों को ज़िन्दगी जीने के नए मायने देंगे।

लेकिन अपने भी एक उस्ताद हैं- गीतकार शैलेन्द्र। हिरानी साहब के लिए उनका लिखा कुछ याद आ रहा है-

सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है ।

ना हाथी है ना घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है।

तुम्हारे महल चौबारे,यहीं रह जायेंगे सारे।

अकड़ किस बात की प्यारे, ये सर फिर भी झुकाना है।

भला कीजै भला होगा,बुरा कीजै बुरा होगा।

बही लिख लिख के क्या होगा,यहीं सब कुछ चुकाना है।

लड़कपन खेल में खोया, जवानी नींद भर सोया।

बुढ़ापा देख कर रोया, वही किस्सा पुराना है ।

सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है ।

ना हाथी है ना घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है।

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