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क्या भाजपा को आने वाले समय में भाजपा और आरएसएस से चुनौती मिलेगी?

अतुल पांडेय फिल्म निर्माता हैं। किसानों की आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय पर आपकी बनायी फिल्म समर 2007 खासी चर्चा में रही थी। फिलहाल ‘मनी देवो भव’ और ‘बाम्बेरिया’ के निर्माण में व्यस्त अतुल सोशल मीडिया पर अपनी टिप्पणियों को लेकर चर्चा में बने रहते हैं।

मोदी के विरोध को ही अपना राजधर्म मानने वाले लोग अक्सर एक सवाल करते हैं कि 15 लाख रूपये सबके खाते में कब आयेंगे? अच्छे दिन कब आयेंगे? हालांकि मेरी कोई प्रतिबद्धता इस सवाल का जवाब देने की नही है, ना ही मेरे इस सवाल का जवाब देने से इन लोगों के मुंह बंद हो जायेंगे। लेकिन एक जागरूक नागरिक होने के नाते मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं इस सवाल का जवाब दूं।

15 लाख रुपये सबके खाते में आने वाली बात महज शब्दों का खेल हैं जिसे मोदी के लिए नफरत फैलाने वालों ने खेला है। सच तो ये है कि मोदी ने कभी ऐसा कोई वादा किया ही नही था। मोदी के अनुसार इस देश में कांग्रेस के शासन में जो लूट हुयी है,अगर उसका हिसाब लगाया जाये तो प्रत्येक भारतीय के हिस्से 15 लाख रुपये आयेंगे यानि की जो देश का नुक्सान हुआ है उसमें प्रत्येक का नुक्सान 15 लाख रुपये का बनता है।

यहां अब इन बातों को दोहराने की आवश्यकता नही है  कि देश को राजनेताओं ने किस तरह से लूटा है। ऐसा नही है कि देश में कुछ भी विकास नही हुआ है। हुआ है। लेकिन इस विकास की कीमत कांग्रेस ने आम आदमी की चमड़ी उधेड़ के वसूली है। कोई भी नयी योजना कांग्रेस  के लिए पैसा बनाने का साधन बन जाती थी। स्वर्गीय राजीव गांधी जी ने स्वयं इस बात को माना था कि विकास के काम के लिए दिए गए 100 रुपयों में से सिर्फ 15 रुपये ही सही आदमी के पास पंहुच पाते हैं। सरकारी भ्रष्टाचार का ये आरोप स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा लगाया गया था। लेकिन एक बात वो छुपा गए थे कि इस लूट में उनके पास कितना पैसा आता है। ये सच तो सब जानते हैं कि रिश्वत लेने वाला रिश्वत का एक हिस्सा अपने पास रखकर बाकी पैसा उपर तक पंहुचाने के लिए बाध्य होता है। कांग्रेस ने इस देश पर लंबे समय राज किया है तो ये समझना मुश्किल नही कि उसके खजाने में कितना पैसा आया होगा और राजघराने को कितना मिला होगा।

60और 70 के दशक में इस तरह से कमाये पैसे को सुरक्षित रखने के लिए सोने में निवेश एक अच्छा साधन था। चुनाव के समय इस पैसे का इस्तेमाल वोट और नेता खरीदने के लिए भी किया जाता था। सोने को सुरक्षित रखने के लिए धार्मिक ट्रस्टों का इस्तेमाल होता था जिनपर कांग्रेस नेताओं का वर्चस्व होता था। जब काले धन की मात्रा बढ़ने लगी तो बाहर के बैंको का इस्तेमाल पैसा रखने के लिए किया जाने लगा। लेकिन इन बैंको में पैसा रखने में एक समस्या थी। ये आपको जमाराशि पर ब्याज ना देकर उसे अपने यहां गोपनीय और सुरक्षित रखने के लिए पैसे चार्ज  करते थे। जमा पैसा कम होने लगा जो राजनेताओ को अच्छा नही लगता था। अब पैसों को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे उपायों की ज़रूरत महसूस होने लगी।

इसके बाद 91-92 में मनमोहन सिंह के दौर में आर्थिक स्वतंत्रतता का दौर शुरू हुआ। विदेशी संस्थानो से नयी मदद मिलनी शुरू हुयी। इस आर्थिक स्वतंत्रतता के दौर में विदेशी बैंको से पैसा निकाल कर टैक्स हैवन माने जाने वाले देशो से भारत के शेयर बाज़ार और रियल इस्टेट में इंवेस्ट किया जाने लगा। 90 की शुरूआत में शेयर बाज़ार और रियल इस्टेट में आया उछाल इस बात की पुष्टि करता है।

इस पैसे के कुछ हिस्से का इस्तेमाल कांग्रेस द्वारा सुनोयोजित ढंग से खास खास एन जी ओं को फंड करके अपने हित में काम करने के लिए किया जाने लगा।

विकास के नाम पर किसानों की ज़मीन का इस्तेमाल करोंड़ों के फ्लैट बनाने के लिए किया जाने लगा। किसान को ज़मीन के मुआवजे का ऐसा चस्का लगा कि वो खेती करने की बजाय जमीन बेचने में खुश हो गया। मध्यम वर्ग के हाथ से घर निकलने लगा। बाज़ार पर कब्ज़ा प्रापर्टी डीलर्स और नए बिल्डर्स का हो गया। चारो तरफ विकास के नाम पर विनाश का खेल शुरू हुआ और नदियों, नालों,जंगल, खेत खत्म करके बिल्डिंगे बननी शुरू हो गयीं। अपने गांव देहात से काम की तलाश में शहर पंहुचे लोगों को सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा करके बसाने का खेल शुरू हुआ। इन लोगों को वोट बैंक के रुप में कांग्रेस ने इस्तेमाल किया। सरकारी ज़मीन पर कब्जा करने वाले माफियाओं ने आगे चलकर ये ज़मीन बिल्डर्स को बेच दी। अधिकांश बिल्डरों के पास नेताओ का काला धन था था जिसका उपयोग उन्होंने ज़मीनो को मंहगे दामों पर खरीदने के लिए किया। एक पूरा बाज़ार तंत्र इस काम के लिए विकसित किया गया। भ्रष्टाचार की जड़े ओर गहरा गयीं।

2014 में मोदी ने जनता को ये बताया कि किस तरह से हर भारतीय की जेब पर डाका डाला गया है तो जनता को भ्रमित करने के लिए 15 लाख रुपये का दांव खेला गया। मोदी का एक ही मिशन था और है किसी भी तरह से जो पैसा भ्रष्ट नेताओ द्वारा लूटा गया है वो वापिस लाया जाये। वो पैसा चाहें ज़मीन में लगाया गया हो या फिर सोने में या काले धन के रूप में किसी के तहखाने में सड़ रहा हो ।

आज मोदी की नीतियों के फलस्वरुप काले धन के कारोबारी संकट में हैं। डीमोनिटाइजेशन के बाद रेरा ने उनकी कमर तोड़ दी है। आज हम देखें तो सातवें आसमां पर पंहुचे रियल इस्टेट के दाम धरती पर आ गये हैं और आने वाले समय में इनके ओर कम होने के आसार हैं। पुराने नोटों को नए में बदलने वालों को राहत नही मिली है। सरकार चारों ओर से इस तरह के लोगों को घेर रही है। ये कहना अभी गलत होगा कि भ्रष्टाचार से लोगों को मुक्ति मिल गयी है, हां ये कहा जा सकता है इसमें कमी आयी है।

अब अगर आपके खाते में आये 15 लाख रूपये की बात करे तो लोग सहज समझ सकते हैं मोदी का आशय ये कहते समय क्या रहा होगा। उनके अनुसार औसतन 15 लाख रुपये प्रत्येक नागरिक से लूटे गए हैं। लेकिन जो व्यक्ति दो वक्त की रोटी भी नही खा पा रहा हो उसका 15 लाख रुपये का नुक्सान कैसे हुआ होगा। लेकिन शब्दों से खेलने वालों ने ये खेल खेल ही दिया।

बाज़ार में काला धन कम होने के कारण अगर हम 2014 के दामों से तुलना करें तो रियल इस्टेट में इसका प्रभाव दिखने लगा है। दाम तेजी से गिरे हैं। अगर इससे होने वाले फायदे को देखा जाये तो प्रत्येक खरीददार को 15 लाख से ज़्यादा की बचत होती दिख रही है।

आखिर मोदी का विरोध देश के बड़े राजनैतिक घराने क्यों कर रहें हैं । क्यूं वो लोग परस्पर विरोधी विचारधारा के होने के बावजूद मोदी के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। वजह सिर्फ इतनी हैं, काले धन पर चोट खाने के बाद अब वो रियल इस्टेट में लगे धन को डूबने से बचाना चाहते हैं। वो मोदी की बेनामी संपत्ति के खिलाफ लड़ाई में एकजुट होकर मोदी के खिलाफ अपने डूबते साम्राज्य को बचाने की आखिरी कोशिश कर रहे है। ध्यान रहे देश में फैले बाबा भी बेहिसाबी जंमीन के मालिक हैं। एक बात तो स्पष्ट है मोदी के होते इनके सर पर तलवार तो लटकती रहेगी।

भारत के भ्रष्ट नेताओ और बाबाओं को अब तक ये बात तो समझ आ गयी होगी कि मोदी से पंगा लेना ठीक नही है। मोदी की देश के विकास की कल्पना और राह में जो भी रोड़ा बनेगा उसकी दुर्गति होना तय है। हो सकता है मोदी में बनावट ना हो, आर एस एस का स्वयंसेवक होने के बावजूद वो देश को चलाने के मामले में कोई रुकावट पसंद नही करता।

गुजरात चुनाव में मोदी ने स्वयं को दांव पर लगाया हुआ है और कोई आश्चर्य नहीं कांग्रेस गुजरात में अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन करे। कांग्रेस का ये सिलसिला हिमाचल और कर्नाटक में भी जारी रहने वाला है। मेरे हिसाब से तो अभी मोदी ने शुरू भी नही किया है, 2018 देश के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने वाला है।

राुहुल के नेतृत्व में कांग्रेस का खराब प्रदर्शन आगे भी जारी रहने वाला है। मेरे अनुसार सत्ता को निरंकुश होने से बचाने के लिए देश में एक सशक्त विपक्ष का होना आवश्यक है। जिसकी संभावना फिलहाल तो दिखायी नही दे रही। यही हाल रहा तो आने वाले तीन चुनावों में देश की बागडोर भाजपा के हाथ में ही दिखाई दे रही है और उसके बाद आज की भाजपा/आर एस एस से ही एक विकल्प निकलेगा जो भाजपा को चुनौती देगा।

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