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हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी जिस को भी देखना हो कई बार देखना – मशहूर शायर निदा फाजली

‘कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता.’

हर ज़िंदा इंसा की ख्वाहिशों को आवाज़ देते ये अल्फ़ाज़ हिंदी उर्दू के मशहूर शायर निदा फाजली के द्वारा लिखे गए हैं । निदा फाजली को आसान भाषा में लिखेी शायरियों के लिए खास तौर पर याद किया जाएगा. निदा फाजली का असली नाम मुक्तदा हसन था. उनकी लिखी गजलों को जगजीत सिंह की आवाज ने लाखों-लाख लोगों तक पहुंचाया.

निदा फाजली हिंदी उर्दू की अदबी दुनिया के सितारे थे. उन्होंने बेशक तमाम फिल्मों में गाने लिखे पर उनकी शायरी इससे मटमैली नहीं हुई. उसमें इंसानियत की खुशबू दिनोदिन परवान चढ़ती रही. उनके लफजों में ऐसा मीठापन था कि सुनने वाला किसी धुन में खो जाए.

निदा फाजली शायरी में डूबे हुए उस शख्स का नाम है जिसकी शायरी, दोहों, गजलों, नज्मों से रसखान रहीम तुलसी गालिब और सूर के पदों की सुगंध आती है. समाज में जिस वक्त फिरकापरस्ती का आलम हो, इंसान इंसान के बीच खाइयां पैदा करने वाली ताकतें फूल फल रही हों, ऐसे में निदा फाजली जैसे शायर मनुष्य की चेतना को इंसानियत की खुशबू से मालामाल कर देते हैं. दिल्ली में जन्मे और ग्वालियर से पढ़ाई करने वाले मुक्तदा हसन के बारे में भला कौन जानता है कि यह शख्स एक दिन निदा बन कर हवाओं में दिलों में चेतना में गूंजेगा और जिसकी आवाज में जिसके शब्दों में खुदा की-सी आवाज़ गूंजेगी. पर कश्मीर के फाजिला इलाके से दिल्ली आ बसे इस परिवार ने निदा पहले शख्स से जिसने अपना नाम बदल कर निदा फाजली रखा यानी फाजिला इलाके की आवाज़ जो आज शायरी की दुनिया में एक भरोसेमंद नाम है. आप दुख में खोए हुए हों तो उनके दोहे आपके जख्मों पर रुई का फाहा रखते हैं. आप परदेस में हो तो घर को याद करके आप उनकी शायरी से दिल बहला सकते हैं.

निदा ने अपने फिल्मी गीतों के सफर की शुरुआत कमाल अमरोही की फिल्म रज़िया सुल्तान से की और उसके बाद उन्होंने कई फिल्मों के लिए गीत लिखे. शायरी की दुनिया यों तो बहुत व्यापक है. पर शायरी की सदियों की परंपरा जब आधुनिकता की दहलीज पर पहुंचती है तो काफी कुछ बदलता है. इस अर्थ में समाज में चाहे जितनी गिरावट हो, पर अभी भी हर पीढ़ी में शायरों से मुहब्बत करने वाले लोग हैं, जो महफिलों में शायरी सुनना पसंद करते हैं. शायरी में संवेदना का जो गाढा रसायन आज के शायरों में बशीर बद्र, वसीम बरेलवी और मुनव्वर राणा में मिलता है, निदा फाजली में इन सबके तत्व एक साथ नजर आते हैं. निदा में जो सूफियाना अंदाज है वह उन्हें इंसानियत के सबसे मजबूत धागे से जोड़ता दिखाई देता है. जब वे कहते हैं घर से मस्‍जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए ।

निदा फाजली हिंदी उर्दू की अदबी दुनिया के सितारे थे. उन्होंने बेशक तमाम फिल्मों में गाने लिखे पर उनकी शायरी इससे मटमैली नहीं हुई. उसमें इंसानियत की खुशबू दिनोदिन परवान चढ़ती रही. उनके लफजों में ऐसा मीठापन था कि सुनने वाला किसी धुन में खो जाए. वे एक तजुर्बेकार इंसान थे उनकी शायरी में उनका तजुर्बा झलकता है। बहुत हिसाबी किताबी वे न थे इसलिए वे किताबी दुनिया से बाहर आने का आहवान करते थे और अपना पैगाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे के फलसफे में यकीन करते हुए इस बात के हामी थे कि इंसान को खुद आगे बढ़ कर हाथ मिलाने को तैयार रहना चाहिए.

लेखन में अपने भविष्य को तलाशते हुए वे 1964 में नौकरी के सिलसिले में मुंबई पहुंचे और यहीं के होकर रह गए. मुंबई और बॉलीवुड में रहते हुए उन्होंने कई गीत, ग़ज़ल और नज़्मे लिखी जो आज भी उतनी ही उसी शिद्दत से सुने जाते है. निदा साहब 16 फ़रवरी 2016 को 78 वर्ष की उम्र में इस दुनिया से विदा हो गए, लेकिन उनके गीतों, ग़जलों और नज़्मों से वे आज भी ज़िंदा है.

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