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बैंको का घोटाला, बढ़ता बट्टा खाता …5 जरूरी कदम

आर्थिक मामलोँ के एक्सपर्ट व चार्टर्ड अकाउंटेंट

CA D.K. Mishra

 

देश की ईतनी बड़ी आबादी के संचालन के लिए संसाधन और सुविधाओं के साथ सुदृढ़ अर्थव्यवस्था का होना नितांत आवश्यक है।

जिसमे बैंकिंग व्यवस्था रीढ़ की हड्डी है। अगर इसमें बड़े पैमाने धोखाधड़ी या चोरी होती रही तो विकास का तानाबाना व सशक्त भारत का सपना मुश्किल होगा।

पी एस यू बैंको के संचालन की व्यवस्था और प्रारूप दोनों ही दुर्घटना उन्मुख है।उसमे विशेषतौर पर कर्ज देने या उसके नवीनीकरण (ख़ासतौर पर बड़े लोन) की प्रक्रिया ,तौर -तरीके और जोखिम प्रबंधन में काफी खामियां उजागर हो रही है। उसी के परिणामस्वरूप उभरते घोटाले और बढ़ते बट्टे खाते,देश के अर्थजगत को भूकम्प की तरह दहलाने वाले साबित हो रहें है। सरकार इस दिशा में सुधार के कई महत्वपूर्ण कदम उठा रही है जो लगता है पर्याप्त नहीं है ।
निम्नलिखित 5 बातों का ध्यान रखते हुए कई क़दम जल्दी उठाने और सुधार प्रक्रिया में तेजी लाना चाहिए।

1) बैंकिंग कार्य प्रणाली में बड़ा सुधार (रिफार्म)

हर्षद मेहता, केतन पारेख व जिग्नेश शाह जैसे बड़े घोटालों ने शेयर बाज़ार के कार्यप्रणाली में बड़ा सुधार या बदलाव के लिए विवश किया । इसी तर्ज़ पर बैंक घोटालों, बढ़ते बट्टे खाते, संदेहास्पद कर्ज़, बैंकिंग सेक्टर में बड़े सुधार की आवश्यकता पर सरकार को विवश करते है।
पी एस यू बैंक की संचालन व्यवस्था टूटी-फूटी व पुराने ढंग कि साबित हो रही है। बैंक का प्रबंधन एक ऐसे बोर्ड द्वारा होता है जिसमे कुछ असक्षम नामित सदस्य होते है जिनका योगदान निम्न होता है। बैंकिंग बोर्ड के पास लक्ष्य निर्धारण व परफॉर्मेंस प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण अधिकार नहीं होते है। कई बैंक का सी ई ओ या एग्जेक्युटिव डायरेक्टर बोर्ड से नियुक्त नहीं होता और उसमें सरकारी दखलंदाजी होती है,और उसे भी एक बैंक से दूसरे बैंक में रोटेट किया जाता है।परिणामस्वरूप इस जटिल सेक्टर को ढंग से चलाना और भी चुनौती पुर्ण साबित हो रहा होगा।
4 वर्ष पूर्व पी जे नायक कमिटी के रिपोर्ट भी सरकारी बैंको में कमजोर व्यवसायिक रणनीति और जोखिम प्रबंधन पर आगाह कर चुकी है।

एक माइंडसेट के साथ पूरे ढाँचे, संचालन की प्रक्रिया व अधिकारियों के क्षमता व सुधारों पर विचार करना होगा।
कुछ पी एस यू बैंक का निजीकरण होना भी आवश्यक है भले निहित स्वार्थ के लोगों का विरोध ही क्यों न हो। बैंको को सरकार द्वारा आर्थिक सहायता या आधी अधूरी री-कैपिटलाइजेशन ही काफी नहीं है।

2) बैंकिंग सेक्टर के परफॉर्मेंस

नियामक ,बैंक प्रबंधन व उच्च अधिकारियों को मिलकर इस सेक्टर के बेहतर परफॉर्मेंस पर काम करना होगा। जवाबदेही के साथ अधिकारोँ का ज्यादा से ज्यादा विकेंद्रीकरण , दायित्वों का कठोरता से पालन, तकनीकी के अच्छे जानकर व बेहतरीन अधिकारियों को प्रोत्साहन व अच्छे काम की संस्कृति, नेतृव प्रबंधन, इत्यादि ज़रूरी कदम उठाने होंगे।
कर्ज़ बॉटने में जो राजनीतिक हस्तक्षेप होता है या सरकारी उदेश्यों को चलाने,चाहे कर्ज़ माफी अभियान या उन इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को कर्ज देना जो जोखिमपूर्ण हों, ये भी बैंक को कमजोर करते है।इन्हें भी सुधारने पड़ेगे।

3) पुराने कर्ज़ की समीक्षा व नए कर्ज़ मे चौकसी।

विलफुल डिफॉल्टर्स की लंबी सूची, बढ़ते एन पी ए ( किसी आय का सृजन न करने वाले कर्ज़) और दिए कर्ज़ को बट्टे खाते में परिवतिर्त होना इस सेक्टर के लिए असाध्य रोग सा बनता जा रहा है। इसलिए कर्ज़ की समीक्षा नितांत ज़रूरी है। जबतक धोखाधड़ी करने वाले ये जानते है कि चोरी का खास अंजाम नहीं और धोखे से पैसा लेना आसान है, ये लूट का सिलसिला थमनेवाला नहीं।
ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि इंडियन बैंकिंग में धोखाधड़ी एक सबसे बढ़ता व्यवसाय बन गया है।

पुराने कर्ज़, जिसमें बैंक को चिन्ता शुरू होती प्रतीत हो (स्टिकी लोन) उनके ऊपर तुरंत चौकसी हो, कर्ज़दाताओं व परिजनों के पॉसपोर्ट की ज़ब्ती व जमानतदारों के साथ कर्ज़दाताओं के सम्पत्तियो पर निगरानी शुरू हो जानी चाहिए।

साथ ही नए कर्ज़ को बॉटने का मानक व प्रक्रिया की आमूल चूल समीक्षा और उसने आवश्यक सुधार होनी चाहिए।

4) टेक्नोलॉजी का और सुदृढ़ीकरण

लगातार पी एस यू बैंको के तकनीकी सुधार व एक बड़ी राशी निवेश के बाद भी टेक्नोलॉजी के अपूर्ण जानकारी व दुरूपयोग के कारण चोरी, धोखाधड़ी बढ़ती जा रही है। इसलिए बैंक की टेक्नोलॉजी की गहन समीक्षा होनी चाहिए, रियल टाइम रिपोर्टिंग और साथ में साइबर से जुड़े अपराध को रोकने की भी टेक्नोलॉजी सुदृढ होना चाहिए।
यह भी पाया गया है कि इन बैंकों मे ऐसे अधिकारी जो टेक्नोलॉजी, जोखिम प्रबंधन, फ्रॉड कन्ट्रोल, या आन्तरिक नियंत्रण में दक्ष व विशेषज्ञ हों,उनकी कमी है।इन क्षेत्रों में नेतृत्व की भी कमी है या काम का परिवेश ठीक नहीं।इन सभी पर सुधार करना होगा।

5) बैंको का ऑडिट

बैंकों के ऑडिट के तरीके और दृष्टिकोण में भी बदलाव जरूरी है। मैन्युअल तरीका, विकेंद्रीत या कारोबार चलित ऑडिट से हटकर, एक डायनामिक ऑडिट जरूरी है।जिसमें तीन पहलुओं का होना अतिआवश्यक है

सुरक्षात्मक(प्रीवेंटिव)
विश्लेषात्मक (एनालिटिकल)
कुशलतापूर्व (इंटेलिजेंट)

इस बिन्दु पर भी ‘इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट ऑफ इंडिया’ के साथ मिलकर कदम उठाना जरूरी है।

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