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बाबरी पर सुप्रीम कोर्ट फैसले के मायने-प्रियप्रकाश

बाबरी प्रकरण पर अभी सुप्रीम कोर्ट का सभी अभियुक्तों पर मुकदमा चलाने का निर्णय आये है.कोर्ट के इस निर्णय के बाद देश में एक बार फिर ये मुद्दा चर्चा में आ गया है. वरिष्ठ पत्रकार प्रियप्रकाश इस फैसले पर अपना नज़िरया बता रहे हैं.

25 साल बाद बाबरी मस्जिद का जिन्न एक बार फिर निकल आया है । सुप्रीम कोर्ट ने बीजेपी के शीर्ष नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश के आरोपों को बहाल करते करने के लिए सीबीआई की याचिका को स्वीकार कर लिया है। राम मंदिर से जुड़े अब सभी मामले एक ही अदालत में सुने जाएंगे। इतने बरस बाद आए इस फैसले का मतलब क्या है? क्या इसका कोई दूरगामी असर पड़ने वाला है ? क्या लालकृष्ण आडवाणी,मुरली मनोहर जोशी,केन्द्रीय मंत्री उमा भारती जैसे शीर्ष नेताओं का नाम आने से बीजेपी या केन्द्र सरकार पर कोई असर पड़ेगा ? सबसे महत्वपूर्ण यह की उस समय उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को इससे अलग रखा गया है ।

बाबरी मस्जिद को लेकर आए फैसले का सबसे बड़ा असर राष्ट्रपति चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी दोनों का नाम इस रेस में आगे है दोनों अभी बीजेपी के मार्गदर्शन मंडल में हैं और इस पद के लिए सबसे सटीक उम्मीदवार बताए जा रहे हैं । अब जबकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है तो कुछ लोगों को इसमें राजनीतिक रंग दिखाई देने लगा है विपक्षी दलों का कहना है की नरेन्द्र मोदी सरकार की आडवाणी को राष्ट्रपति की दौड़ से बाहर करने की सोची समझी राजनीति के तहत यह आदेश आया है । मगर इस तरह के बयान ठीक नहीं है। ऐसे बयानों से अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाना ठीक नही है। ऐसे बयानों से अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाना सही नहीं है । दूसरी बात बीजेपी भी कभी ऐसा नहीं चाहेगी । किसी भी दल के शीर्ष नेताओं पर आपराधिक मामला चलने पर अंतत: पार्टी की ही छवि पर असर पड़ता है । इसे गुजरात दंगे के समय की घटना से भी जोड़ कर देखा जा रहा है । तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को राजधर्म निभाने को कहा था और लग रहा था की उन्हें हटाया जाएगा तब दिल्ली से दूत बनकर गए लालकृष्ण आडवाणी ने मदद नहीं की थी । पार्टी की एक और बड़ी नेता उमा भारती है । उमा भारती केन्द्र में मंत्री है ऐसे में उनपर भी इस्तीफे का दवाब बढ़ सकता है। लेकिन उमा भारती ने साफ कर दिया है की जो भी किया खुल्लमखुल्ला किया इसीलिए इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता है । इन दोनों नेताओं पर पार्टी भी अभी पूरी तरह से एकजुट दिखाई दे रही है ।


बीजेपी के एक और बड़े नेता कल्याण सिंह का मामला थोड़ा अलग और रोचक भी है । बाबरी मस्जिद की घटना के समय कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे बतौर मुखिया बाबरी मस्जिद के गिरने के पीछे सबसे बड़ी जिम्मेदारी उन्हीं की बनती है । 6 दिसंबर 1992 की घटना के बाद उन्होंने कहा भी था कि अगर सजा देना है तो मुझे दो, मेरी नैतिक जिम्मेदारी है और मैं जेल जाने और सजा भुगतने को तैयार हूं । बाबरी मस्जिद की घटना के समय सबसे सशक्त और ताकतवर मुख्यमंत्री के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुके कल्याण सिंह बाद के दिनों में हाशिए पर चले गए और पार्टी तक छोड़ दी । बाद में जब पार्टी में वापसी हुई तो वो राज्यपाल बना दिए गए । कल्याण सिंह अभी राजस्थान के राज्यपाल हैं । शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा है की राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के पास संवैधानिक छूट प्राप्त है और उनके खिलाफ मामला पद छोड़ने पर ही चलाया जा सकता है । यानी अगर कोई राज्यपाल या राष्ट्रपति चुन लिया जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत यह छूट मिली है की उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती । अब पूरा मामला नैतिकता पर आकर ठहर जाता है । क्या नैतिकता के आधार पर कल्याण सिंह को इस्तीफा दे देना चाहिए ? या केन्द्र केन्द्र सरकार को उनसे इस्तीफा ले लेना चाहिए या इस्तीफे के लिए दवाब बनाना चाहिए ? सवाल उठता है की केन्द्र सरकार आखिर ऐसा क्यों करेगी ? इतिहास को खंगालें तो ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब किसी गंभीर मामले में नाम आने पर राज्यपाल को इस्तीफा देने को कहा गया या इस्तीफा लिया गया है । हाल ही में मेघालय के राज्यपाल वी षणमुगनाथन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था । 20 मई 2015 को षणमुगनाथन ने मेघालय के राज्यपाल का पद संभाला था और डेढ साल के अंतराल में उन्हें अरूणालचल प्रदेश का भी अतिरिक्त प्रभार मिला था लेकिन यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगने के कारण आखिर उन्हें इस्तीफा देना पड़ा । इससे पूर्व आंध्रप्रदेश के राज्यपाल रहे नारायण दत्त तिवारी पर भी राजभवन में रासलीला रचने के आरोप में इस्तीफा देना पड़ा था । 2009 एक एक चैनल ने ऐसी तस्वीर और वीडियो प्रसारित की जिसमें 85 साल के तिवारी को आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया था ।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम के नारायणन के इस्तीफा देने पर अड़े रहने के बावजूद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था । अगस्त वैस्टलैंड मामले में 36000 करोड़ के हेलिकॉप्टर सौदे में रिश्वत के आरोप में सीबीआई ने नारायणन से बतौर गवाह पूछताछ की थी । सीबीआई के अनुसार नारायणन उस समूह में शामिल थे जिसने हेलिकॉप्टर खरीदने के पहले निविदा प्रक्रिया को देखा था। इसी कड़ी में गुजरात की गवर्नर रह चुकी कमला बेनीवल पर भी वित्तीय अनियमितता के गंभीर आरोप लगने के बाद राष्ट्रपति ने गवर्नर को पद से बर्खास्त कर दिया था । इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे लेकिन सवाल वहीं नैतिकता का है ।

सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में रोजाना सुनवाई करने को कहा है और विशेष अदालत को दो साल में फैसला देने को कहा है । फैसला जो भी आए लेकिन इतना साफ है की जिस बाबरी मस्जिद की घटना के देश की राजनीति को नई दिशा दी वो समय समय पर यूं ही सामने आता रहेगा जिससे राजनीतिक हलचल होगी । इंतजार कीजिए ।

प्रियप्रकाश
लेखक सहारा के बिहार-झारखंड चैनल में कार्यरत हैं

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