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अथ श्री अरुणप्रभा कथा

नया चैनल लांच करने को लेकर डीडी के अधिकारियों का  खेल 

डीडी न्यूज में हुई धांधली, नया चैनल शुरू करने के नाम पर चहेतों को बांटे गए कार्यक्रम

नार्थ ईस्ट के नाम पर नया चैनल शुरू करने की थी बात, जबकि पहले से चल रहा चैनल

आदित्य भारद्वाज, नई दिल्ली

हरि अनंत हरि कथा अनंता । प्रसार भारती की बात करें तो ये पंक्तियां एकदम सच साबित होती दिखायी देती हैं। कुछ दिन पहले हमने आपको बताया था दूरदर्शन के किसान चैनल में चल रहे खेल के बारे में । आज उसी कड़ी को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं और बात करते हैं अरूणप्रभा चैनल की। ये चैनल देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों की जनता के लिए शुरू किया जाना था। प्रसार भारती के प्रमुख ए.सूर्यप्रकाश ने इस चैनल को 25 दिसम्बर 2016 को शुरू किए जाने की घोषणा की थी। लेकिन आज लगभग 1 साल बाद भी इस चैनल का कोई अतापता नही है। मज़ेदार बात ये है कि इस चैनल को शुरू करने के लिए दूरदर्शन के पास बजट भी नही है और करोड़ों के कार्यक्रम बनाने के लिए बांट दिए गए हैं। ऐसे में इस चैनल के बारे में सवाल खड़े होने लाज़मी हैं।

सबसे पहला सवाल तो ये उठता है कि जब उत्तर-पूर्व के लोगों के लिए दूरदर्शन के पास एक चैनल पहले से ही था तो अरूणप्रभा को शुरू करने की आवश्यकता क्या थी?  वो भी तब जब आप संसाधनो की कमी से जूंझ रहे हों। किसने किस नियत से ये इस चैनल को शुरू करने का सुझाव दिया इसकी जांच होनी आवश्यक है।

जानकारी के अनुसार करीब साल भर पहले डीडी ने नार्थ ईस्ट के नाम पर एक नया चैनल शुरू करने की कवायद शुरू की। उस समय सूचना प्रसारण मंत्रालय ये रिटायर हुए सचिव सुनील अरोड़ा प्रसार भारती के सलाहकार नियुक्त हुए थे। उन्हें इस चैनल की जिम्मेदारी सौंपी गई। अरुणप्रभा नाम से इस चैनल को शुरू किया जाना था। हालांकि अभी तक यह चैनल शुरू नहीं हुआ लेकिन चैनल के प्रोग्राम बनाने को लेकर बंटरबांट खूब हुई। इस चैनल के लिए जो 10 करोड़ रुपए गृह मंत्रालय से लिए गए वह डीडी नार्थ ईस्ट की पिछली देनदारी में चुका दिए गए। ऐसे में चैनल के लिए कोई पैसा डीडी के पास नहीं बचा। इसके बाद भी चैनल शुरू करने की तैयारी शुरू कर दी गई। चैनल के कार्यक्रमों के लिए बाहर के प्रोड्युसर प्रोग्राम बनवाने का फैसला लिया गया। इसके लिए  विज्ञापन दिया गया और प्रपोजल मांगे गए। करीब  11 सौ प्रपोजल डीडी को इसके लिए लिए आए। इसके बाद असल खेल शुरू हुआ। जिसमें अपने खास लोगों को फायदा पहुंचाया गया।  इस दौरान ट्रेवलॉग,  रियलिटी शोज, टेली  फिल्म, थ्रिलर,मॉयथोलॉजी, डाक्यूमेंट्री, क्विज प्रोग्राम, डेली शॉप  की कैटेगरी बनाई गई। इसके तहत 56 प्रोडेक्शन हाउस को काम दिया गया। इसमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने कभी कोई प्रोग्राम नहीं बनाया। यहां तक की आर्टस एंड क्राफ्ट्स हाउस को टीवी के लिए प्रोग्राम बनाने का काम सौंपा गया। यह सब तक किया गया जबकि डीडी के पास उनको देने के लिए पैसा नहीं था। ये बात दीगर है कि सालभर होने के बाद भी अरुणप्रभा अभी तक शुरू नहीं हो पाया। एक साल पहले पहले प्रसार भारती के चेयरमैन सूर्यप्रकाश ने एक साक्षात्कार के दौरान अरुणप्रभा के जल्द शुरू होने की बात कही थी, लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हुआ। सूत्रों के अनुसार अरुणप्रभा चैनल की लॉचिंग में हुई धांधली को लेकर विभागीय जांच भी बैठी हुई है, जो इस पूरे मामले की जांच कर रही है। हालांकि इस जांच में कोई दोषी पाया जाएगा इसकी कोई संभावना नहीं दिखाई देती क्योंकि सबकुछ तय नियमों के अनुसार किया गया है, लेकिन जिन लोगों को डीडी की तरफ से काम दिया गया उसमें सिफारिश खूब चली इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

गौरतलब है इस चैनल के पीछे जिस व्यक्ति का दिमाग बताया जा रहा है उसकी नियुक्ति दिल्ली में सजा के तौर पर हुयी थी। देहरादून में रहते हुए इन पर अपने सहयोगियों के साथ अभद्र व्यवहार, मानसिक रुप से प्रताड़ित करने, साथ में काम कर रही महिला सहयोगी से अनुचित अपेक्षा करने के आरोप लगे थे। इनपर बैठी जांच कमेटी ने इन्हे दिल्ली भेजने की सिफारिश की ताकि उनके कार्यकलापों पर नजर रखी जा सके। दिल्ली आकर उन्होंने ये खेल रच दिया।

ऊपर से देखें तो ये एक सामान्य प्रक्रिया दिखायी देती है, लेकिन अगर सतह से कुछ गहराई में जायें तो इस प्रक्रिया में कुछ तो असमान्य है।

कुछ सवाल खड़े होते हैं। जैसे-

आज भी इस चैनल को शुरू करने के लिए दूरदर्शन के पास पैसा नही है। तो अगर आपके पास पैसा नही था, तो आपने इस चैनल के लिए कार्यक्रम बनवाने की प्रक्रिया कैसे शुरू कर दी, क्या ये कार्यक्रम निर्माताओं के साथ ठगी नही है? एक प्रपोजल को तैय्यार करने में और प्रेजेंटेशन के लिए आने तक लोगों ने 1 लाख रूपये तक खर्च किये होंगे। क्या ये उनके साथ अन्याय नही हैं?

बिना पैसे दूरदर्शन ने लोगों को कार्यक्रम बनाने के लिए पत्र भेज दिए। आखिर क्या जल्दी थी? क्या वो सरकार पर दबाव बनाना चाहते थें या फिर खेल कुछ दूसरा था?

जिन लोगों को कार्यक्रम बनाने के लिए कहा गया उनमें से कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने टेलीविजन के लिए कभी भी किसी तरह के कार्यक्रम नही बनाये। एक कंपनी तो ऐसी है जिसकों इस प्रक्रिया के शुरू होने से कुछ दिन पहले ही बनाया गया। एक ही दिन, एक ही समय पर दो कंपनियों के अलग अलग कार्यक्रम के लिए प्रेजेंटेशन हुआ और दोनो को काम मिल गया लेकिन इसमें पेंच ये है दोनो कंपनियों को चलाने वाले लोग एक ही हैं। कहीं ना कहीं इस बात का अंदेशा होता है कि सारी प्रक्रिया में जल्दबाजी अपने चहेतों को कार्यक्रम देकर लाभ पंहुचाने की थी। अब इस खेल में अधिकारियों का कितना भला हुआ होगा ये जांच का विषय है।

गुवहाटी और कश्मीर में माननीय अदालत ने रिएलिटी शो पर रोक लगायी हुयी है। हो सकता है कि दूरदर्शन को इस मामले में कानूनी पचड़ों में फंसना पड़े। दुर्भाग्य यह है कि मोदी सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था की धज्जियां उनके ही लोग उड़ा रहे हैं। जिस तरह से प्रसार भारती काम कर रहा है उससे उसकी मंशा सरकार की समस्याओं को कम करने की बजाय बढ़ाने की है। प्रसार भारती प्रमुख सूर्यप्रकाश व्यवस्था से काम करवाने में असफल साबित हो रहें हैं ।अब ये तय करना होगा कि क्या ये उनकी प्रशासनिक विफलता है या फिर नीयत में खोट। उम्मीद है सरकार इस मामले की ईमानदारी से जांच करायेगी और इस सरकारी ठगी के दोषी लोगों को सजा मिलेगी।

 

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