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एबीवीपी ने की डीयू में शिक्षक नियुक्ति में भेदभावपूर्ण स्क्रीनिंग प्रक्रिया हटाये जाने की मांग

डीयू में सभी रिक्त पदों पर स्थायी नियुक्ति की जाए

  • शिक्षकों की नियुक्ति में यूजीसी निर्देशों का पालन सुनिश्चित हो

दिल्ली विश्वविद्यालय के विभागों व महाविद्यालयों में शिक्षकों के 5000 से अधिक पडी रिक्त पड़े हैं जिनकी वजह से शिक्षा की गुणवत्ता पर विपरीत असर पड़ रहा है. पिछले कई वर्षों से, अदूरदर्शी डीयू प्रशासन व महाविद्यालय प्रशासनों द्वारा स्थायी नियुक्ति करने की बजाय हर छः महीनों में अस्थायी (एडहोक) शिक्षकों की नियुक्ति करना अधिक सुविधाजनक समझा गया परन्तु स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति में कोई रूचि नहीं ली गई. इससे विश्वविद्यालय के विद्यार्थी तथा युवा शोधार्थियों को बहुत नुक्सान हो रहा है और यहाँ के शैक्षिक माहौल पर भी बुरा असर पड़ा है. कई वर्षों बाद अब डीयू प्रशासन द्वारा विभागों में रिक्त पड़े पदों को विज्ञापित किया गया है किन्तु इस प्रक्रिया में कुछ बड़ी खामियां हैं जिनको शीघ्र ही ठीक किया जाना चाहिए. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षकों की नियुक्ति में यूजीसी के नियमों का कड़ी से पालन करने की मांग करती है.

हमने इन खामियों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संज्ञान में लाया था. हम यूजीसी द्वारा इस मामले में त्वरित कार्यवाही का स्वागत करते हैं. अब डीयू प्रशासन को इन कमियों को तुरंत दूर करना चाहिए. हमें जानकारी मिली है कि यूजीसी ने इस आशय एक पत्र डीयू कुलपति को लिखा है जिसमें यूजीसी नियमों को पुनः स्पष्ट करते हुए बताया गया है कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक पर नियुक्ति में साक्षात्कार में बैठने के लिए न्यूनतम अहर्ता यूजीसी रेगुलेशन 2010 के अनुच्छेद 4.4.1 के अनुसार परास्नातक की उपाधि में 55 फ़ीसदी अंक तथा नेट परीक्षा उत्तीर्ण करना है. साथ ही जिन विद्यार्थियों को यूजीसी रेगुलेशन 2009 के नियमानुसार पीएचडी की उपाधि प्राप्त हो, उन्हें नेट उत्तीर्ण करने की बाध्यता नहीं है.

यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति हेतु एक स्क्रीनिंग पद्धति लागू की गई है जिससे युवा शोधार्थियों और उत्कृष्ट परास्नातक-उत्तीर्ण विद्यार्थियों को साक्षात्कार में बैठने से ही रोक दिया जाता है. इस स्क्रीनिंग के अनुसार साक्षात्कार में बैठने की न्यूनतम अहर्ता विभागों हेतु 75 अंक तथा महाविद्यालयों हेतु 60 अंक निश्चित की गई है जिससे युवा शोधार्थी और उत्कृष्ट परास्नातक-उत्तीर्ण विद्यार्थी अपने आप ही नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं क्योंकि उनके पास पढ़ाने का कोई अनुभव या प्रकाशित शोध-पत्र नहीं होते. एबीवीपी का यह स्पष्ट मत है कि इस प्रकार की स्क्रीनिंग प्रक्रिया लगाकर ऐसे उत्कृष्ट विद्यार्थियों के साथ भेदभाव तथा अन्याय किया जा रहा है जो यूजीसी द्वारा तय न्यूनतम अहर्ता को पूरा करते हैं और भविष्य में अध्यापन में करियर बनाना चाहते हैं. इस स्क्रीनिंग की वजह से अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा दिव्यान्गों हेतु आरक्षित पदों पर स्थायी नियुक्ति में भी बाधा आती है. हम मांग करते हैं कि तीनों स्तरों पर सभी आरक्षित सीटों का भरा जाना सुनिश्चित किया जाये.

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन से सहायक प्राध्यापकों के चयन में स्क्रीनिंग प्रक्रिया को तुरंत समाप्त करने की मांग करती है. इस आशय में विद्यार्थी परिषद् का एक प्रतिनिधिमंडल शीघ्र ही कुलपति से मिलेगा ताकि छात्रहित में इस समस्या का तुरंत निदान किया जाए.​

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