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एक पार्टी का अवसान ! -प्रियप्रकाश

एक पार्टी का अवसान !

प्रियप्रकाश

यह अप्रत्याशित नहीं है,नतीजे ठीक वैसा ही है जैसा पूर्वानुमान था। तमाम सर्वेक्षण और एग्जिट पोल में कहा जा रहा था की दिल्ली के एमसीडी चुनाव में बीजेपी की भारी जीत होने वाली है। हुआ भी वैसा ही, तीनों एमसीडी चुनाव में बीजेपी को बड़ी जीत हासिल हुई है। यह जीत बीजेपी के लिए इस मायने में भी खास है क्योंकि उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद लगातार पार्टी की यह दूसरी बड़ी जीत है । इससे पहले महाराष्ट्र में हुए निकाय चुनाव में पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी जबकि महाराष्ट्र में बीजेपी की ही सरकार है। महाराष्ट्र के नतीजे आने के बाद यह कहा जाने लगा था कि शिवसेना से अगल होकर पार्टी अब भी अपने बल बूते खड़ा होने की स्थिति में नहीं है । निकाय चुनाव के नतीजे का असर विधानसभा में नहीं पड़े इस कारण बीजेपी शिवसेना के मेयर के नाम पर आखिरकार सहमत भी हो गई। लेकिन उस पार्टी को क्या हुआ जो ढाई साल पहले दिल्ली के 70 में 67 सीट जीतकर इतिहास रचा वो सरकार में होने के बावजूद 67 वार्ड भी नहीं जीत पाई । ऐसा तब हुआ जब दस सालों से बीजेपी एमसीडी में काबिज है और इस दौरान भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगे। आम लोगों को बात कहने वाली पार्टी आखिर आमजनों तक अपनी बात क्यों नहीं पहुंचा पाई ? दो साल में आखिर ऐसा क्या हो गया कि पहले रजौरी गार्डन उप चुनाव और अब एमसीडी के चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा । दिल्ली से जिस पार्टी का उदय हुआ आखिर दो साल में उस पार्टी का इस कदर पतन क्यों हो गया ?

याद कीजिए साल 2011 के वो दिन जब दिल्ली के रामलीला मैदान में भारत माता के जयकारे लगते थे और वंदे मातरम की धून बजती थी । उस वक्त मंच पर एक दुबला-पतला साधारण सा दिखने वाले उस शख्स को देखकर हर किसी को यही लगता कि उनके बीच से ही उठकर कोई मंच तक पहुंचा है। उसकी भाषा भी आमजनों जैसी होती । वो बड़ी बेबाकी और बहादुरी से कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाता और अडाणी- अंबानी बंधु से हिसाब मांगता। लोगों को लगा की एक नायक मिल गया है जो सरकारी दफ्तरों में घूसखोरी और राशन कार्ड या ट्रांसपोर्ट दफ्तर में चल रही रिश्वतखोरी से अब निजात दिला देगा । यह बिल्कुल नायक वाली छवि थी । इंदिरापुरम से निकली नीले रंग वी वैगन आर गाड़ी का मीडिया के कैमरे तब तक पीछा करते जब तक अंतिम पड़ाव नहीं आ जाता । देखते ही देखते खांसता हुआ वह इंसान हीरो बन गया । उसके मफलर वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर चर्चा का केन्द्र बन गई, लोग हंसी-ठिठोली भी करते लेकिन लोकप्रियता का ग्राफ कम नहीं हुआ ।

2012 में पार्टी का गठन हुआ और 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप को 28 सीटें मिली । कांग्रेस के सहयोग से पहली बार सरकार बनी लेकिन जनलोकपाल बिल के सवाल पर ही मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दे दिया । विपक्ष ने भगौड़ा होने का आरोप लगाना शुरू कर दिया । कहा गया कि दिल्ली की जनता से कोई मतलब नहीं है यह आरोप तब और ज्यादा मुखर हो गया जब 2014 लोकसभा चुनाव में केजरीवाल ने बीजेपी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के मुकाबले वाराणसी से चुनाव लड़ने का फैसला लिया । यह सब सोची समझी रणनीति का हिस्सा था । नरेन्द्र मोदी के मुकाबले में वाराणसी से चुनाव लड़ने का फैसला मीडिया में सुर्खियां बटोरना और राष्ट्रीय राजनीति में खुद को प्रमोट करना था । इसका चलकर फायदा भी हुआ । केजरीवाल ने सीधे सीधे नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाया । एक पर एक आरोप जड़ते चले गए । ऐसा चुनाव के बाद भी जारी रहा। इससे एक छवि बनी की प्रधानमंत्री पर कोई सीधा हमला कर सकता है तो वो केजरीवाल ही हैं । पूरे विपक्ष की कमान केजरीवाल ने अपने कंधे पर ले ली । अरविंद केजरीवाल वाराणसी में चुनाव हार गए और दिल्ली के सातों सीटों पर आम आदमी पार्टी की हार हुई । जो पार्टी 28 सीटें जीती थी वो एक भी हासिल नहीं कर सकी । लेकिन इसके बावजूद केजरीवाल का पीएम पर हमला कम नहीं हुआ ।

दूसरा मौका दिल्ली की जनता ने 2015 में दिया। दिल्ली की 70 में से आप को 67 सीटें मिली। सत्ता में आते ही पार्टी ने अपना वादा निभाया । दिल्ली में बिजली के रेट हाफ कर दिए गए और 20 हजार लीटर पानी मुफ्त कर दिया। सत्ता संभालते ही 24 घंटे के अंदर ये दो बड़े फैसले लेना आसान नहीं था लेकिन इन्ही दो मुद्दों से पार्टी आगे नहीं बढ़ सकी । आखिर बिजली-पानी की सफलता का ठिकरा कब तक फोड़ते रहेंगे ? सत्ता में आते ही विधायकों पर केस दर्ज होने शुरू हो गए । कानून मंत्री का डिग्री विवाद पर मुख्यमंत्री ने खुलकर अपने मंत्री का बचाव किया बाद में डिग्री फर्जी निकली । एक और मंत्री संदीप कुमार पर यौन शोषण के आरोप लगे और पार्टी के प्रवक्ता आशुतोष ने तो गांधी और संदीप कुमार को एक ही खांचे में रखकर नौतिकता का पाठ पढ़ाने लगे । एक और विधायक पर रिश्वत का आरोप लगा । पंजाब चुनाव में ‘आप’ नशे को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ी लेकिन पार्टी के प्रचार के अगुवा रहे सांसद भगवंत सिंह मान पर खुद नशे में संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने का आरोप लगा ।

दिल्ली नगर निगम चुनाव आते-आते अरविंद केजरीवाल चौतरफा आरोप से घिरते चले गए । हताशा में कभी कहा की निगम की सत्ता में आने पर गृहकर माफ कर देंगे तो कभी कहा की सभी अनाधिकृत निर्माणों को नियमित कर देंगे लेकिन फोकस किसी मुद्दे पर नहीं कर सके और ईवीएम को नाक की लड़ाई बना लिया । सरकारी खर्च पर विज्ञापन,शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट, सरकारी खजाने से मानहानि का केस लड़ने और एक सरकारी आयोजन के भोज में 13 हजार रूपए प्रति प्लेट का भुगतान का मामला सामने आया । इन सभी मुद्दों पर पार्टी ठीक ढंग से अपना बचाव तक नहीं कर सकी । शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट आखिर लीक कैसे हुई इस पर कोई सवाल नहीं हुए । 13 हजार की प्लेट का जब भुगतान नहीं हुआ तो भ्रष्टाचार कैसा ? ये सब बातें जनता तक नहीं पहुंच पाई और तो और पार्टी की तरफ से होर्डिंग लगाए गए जिसमें कहा गया कि निगम में बीजेपी सत्ता में आएगी तो बिजली-पानी की कीमतें फिर से बढ़ जाएगी । ऐसा करके पार्टी ने अपना मजाक ही उड़ाया । दिल्ली में बिजली-पानी दिल्ली सरकार के अधीन है ।

बीजेपी ने काफी होशियारी से काम लिया। केजरीवाल ईवीएम में फंसे रहे दूसरी तरफ बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी कई रात झुग्गियों की खाक छाना करते,पूर्वांचली वोटरों से उन्ही की जुबान में बात करते । इसका असर भी हुआ। जो मतदाता कल तक कांग्रेस और आप को अपना समझता था उसे नया चेहरा मिल गया । बीजेपी नेता लाख दावे करे लेकिन उन्होंने अपने सभी निगम पार्षदों का टिकट केवल इसीलिए काटा क्योंकि वे निगम चलाने में नकारा साबित हुए लेकिन निगम चुनाव में भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं बन सका। इसमें मीडिया का भी काफी योगदान रहा। यूपी और उत्तराखंड की जीत के बावजूद बीजेपी निगम चुनाव में जी तोड़ मेहनत करती रही । यही कारण है कि चुनाव से पहले पार्टी अपनी जीत के प्रति इस कदर आश्वस्त हो चुकी थी की बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्री की सभा तक को टाल दिया गया । दिल्ली चुनाव में प्रधानमंत्री समेत तमाम केन्द्रीय मंत्री और बाहर से पार्टी कैडर को बुलाया गया था लेकिन निगम चुनाव में ऐसा कुछ नहीं हुआ । कहा तो यह भी जा रहा है की यूपी के सीएम योगी की बढ़ती लोकप्रियता से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की नींद उड़ी हुई है। योगी भविष्य की चुनौती के रूप में दिखने लगे थे यही कारण है की योगी के तय रोड शो कार्यक्रम को रद्द किया गया और संतुलन बनाए रखने के लिए दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री की सभा को भी स्थगित करना पड़ा ।
बीजेपी ने वोटरों और लोगों के दिलों पर राज करना सीख लिया है । प्रधानमंत्री मध्यमवर्ग के दिमाग में सेंध लगाने में कामयाब रहे हैं । मीडिल क्लास के लोगों को पीएम के वायदों में प्रगति का संकेत नजर आता है । लगभग तीन साल के कार्यकाल में एक आम आदमी को बेशक कुछ भी हासिल नहीं हुआ है लेकिन पीएम की आधुनिकता की भाषा सुनकर मध्यमवर्ग खुश है और नए भारत का सपना संजो रहा है । यह पूछा जा सकता है की एक व्यक्ति की शख्शियत को पार्टी कब तक ढोते रहेगी । संसद के लेकर निकाय चुनाव में सिर्फ पीएम के चेहरे को ढाल बनाया जा रहा है यह न तो लोकतंत्र के लिए ठीक है और न ही पार्टी के लिए ।

वक्त बड़ा बलवान होता है। इतिहास फिर से करवट लेता है । आम आदमी पार्टी के लिए यह मंथन का दौर है । पार्टी को यह सोचना होगा की बेवजह के आरोपों और हो हल्ला को पीछे छोड़कर विकास के एजेंडे पर कैसे ध्यान दिया जाए । बीजेपी के लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है । निगम में दस साल के खराब हालत के बावजूद जनता ने वोट दिया तो उसे यूं ही जाया न करे । बीजेपी के लिए यह सुनहरा दौर है लेकिन सिर्फ एक चेहरे को ज्यादा दिन तक नहीं भुनाया जा सकता । कांग्रेस अब तक हार से सीख नहीं ले पाई है । पार्टी की हालत उस बूढ़े और बेबस बगुले जैसी हो गई है जो हर बार शिकार का इंतजार करता है लेकिन अपनी गिरती सेहत के कारण वो इस काबिल नहीं की शिकार कर सके ।

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