You are here
Home > breaking > बिन बोले बहुत कुछ कहती है ‘किताब’

बिन बोले बहुत कुछ कहती है ‘किताब’

अतुल गंगवार

 

स्व.टॉम ऑल्टर के अभिनय से सजी, कमलेश मिश्रा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘किताब’ बिना बोले बहुत कुछ कह जाती है। आज की युवा पीढ़ी के लिए लाइब्रेरी या पुस्तकालय उतना प्रासंगिक नही रह गया है जितना हमारे ज़माने में था। वो किताब लेने के बहाने से उनसे मिलना, आमने सामने बैठकर ख़ामोश निगाहों का ईशारों में बात करना। ना जाने कितनी सफल असफल प्रेम कहांनियों का जन्म यहीं होता था। हिंदी फिल्मों की एक मुख्य लोकेशन लाइब्रेरी होती थी। वो किताबों के रेक के बीच में से नायक-नायिका का एक दूसरे को देखना। बेख्याली में दोनो का एक दूसरे से टकराना और फिर किताब उठाते हुए दिल के तार जुड़ना, फिर प्यार-इकरार ना जाने कितनी फिल्मों में ये सीन दिखाई देते थे। लेकिन आज वक्त बदल रहा है। सारी जानकारी जो आपको चाहिए वो इंटरनेट के माध्यम से आपके मोबाईल पर मिल जाती है। किसी से बात करनी हो तो फेसबुक है, व्हाट्सएप्प है। लाइब्रेरी आज की युवा पीढ़ी की ज़िन्दगी से कुछ जुदा हो चली है।

कमलेश मिश्रा की ‘किताब’ एक लाइब्रेरियन (अभिनय-टॉम ऑल्टर) की ज़िन्दगी के कुछ ऐसे ही पलों की साक्षी है। एक वक्त होता है जब लाइब्रेरी में आने वाले लोग बहुत संख्या में होते हैं। टॉम की ज़िन्दगी के ये सबसे खुशनुमा पल हैं, वो खुश है।

लेकिन वक्त बदलता है लाइब्रेरी में आने वाले लोगों की संख्या में कमी आने लगती है। वो ये देखकर उदास है, लेकिन तभी एक लड़की उसकी लाइब्रेरी में सदस्य बनती है। लोग अब लाइब्रेरी नही आते हैं।

टॉम के अकेलेपन की साथी अब वो लड़की है। टॉम खुश है। वो उस लड़की के साथ लाइब्रेरी के सन्नाटे को दूर करता है। लेकिन अचानक एक दिन वो लड़की भी उस लाइब्रेरी में आना बंद कर देती है। टॉम उसको खोजते हुए उसके घर पंहुचता है। वो देखता है कि लड़की खुश है, उसके हाथ में लेपटॉप है। वो उससे बात करना चाहता है। लड़की अपने में मगन है। टॉम उदास वहां से लौट आता है… कहानी कुछ ऐसा मोड़ लेती है कि वो लड़की लाइब्रेरी आती हैं लेकिन अब वहां टॉम नही है। क्या होता है? टॉम कहां चला जाता है? वो लड़की लाइब्रेरी क्यूं आती है? इसके लिए तो आपको किताब देखनी पड़ेगी।

‘किताब’ शोर शराबे के युग में संवाद रहित फिल्म है। टॉम ऑल्टर अपनी भाव भंगिमाओं से अपनी व्यथा को दर्शाने में कामयाब हुए हैं। कमलेश मिश्रा के साहस की प्रशंसा करनी चाहिए कि इस कमर्शियल सिनेमा के युग में जहां बाज़ार सिनेमा का कथ्य निर्धारित करता है उन्होंने किताबों की अहमियत पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाया है। एक हद तक वो उसमें सफल भी हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में ‘किताब’ को सराहना मिल रही है। एक फिल्मकार के लिए इससे अच्छी बात ओर क्या हो सकती है। दिल्ली के फिल्मस् डिविजन सभागार में सुलभ आंदोलन के प्रणेता पद्मभूषण डा.विंदेश्वर पाठक, प्रख्यात लेखिका मैत्रेयी पुष्पा, जयंत आडवाणी के साथ टॉम ऑल्टर के चाहने वालों ने इस फिल्म का आनंद लिया। टॉम ऑल्टर के चाहने वालों के लिए एक सुखद अनुभव है ‘किताब’।

 

Leave a Reply

Top